Darpan
Darpan
Ghazal

कभी तीखी, कभी शीरीं, कभी हस्सास लगती है

वो इक लड़की जो हर लहजे में सब को ख़ास लगती है

बला की तिश्नगी आँखों में ले कर फिर रही है वो
जिसे भी देख लेती है उसे फिर प्यास लगती है

उसी की शोख़ियों से बाग़ का हर फूल जलता है
उसी की उँगलियों पे तितलियों की क्लास लगती है

मेरी नज़रों के चारों सम्त उस की याद बिखरी है
मुझे अब हर घड़ी उस से मिलन की आस लगती है

उसी ने हिज्र को भी वस्ल जैसा कर दिया 'दर्पन
वो जितना दूर होती है, वो उतना पास लगती है

— Darpan

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