kabhi teekhi kabhi sheerin kabhi hassaas lagti hai | कभी तीखी, कभी शीरीं, कभी हस्सास लगती है

  - Darpan

कभी तीखी, कभी शीरीं, कभी हस्सास लगती है
वो इक लड़की जो हर लहजे में सबको ख़ास लगती है

बला की तिश्नगी आँखों में लेकर फिर रही है वो
जिसे भी देख लेती है उसे फिर प्यास लगती है

उसी की शोख़ियों से बाग़ का हर फूल जलता है
उसी की उंगलियों पे तितलियों की क्लास लगती है

मेरी नज़रों के चारों सम्त उसकी याद बिखरी है
मुझे अब हर घड़ी उस सेे मिलन की आस लगती है

उसी ने हिज्र को भी वस्ल जैसा कर दिया 'दर्पन
वो जितना दूर होती है, वो उतना पास लगती है

  - Darpan

Phool Shayari

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