Firaq Gorakhpuri

Firaq Gorakhpuri

@firaq-gorakhpuri

📍 Allahabad· India

Firaq Gorakhpuri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Firaq Gorakhpuri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

क्यूँँ इंतिहा-ए-होश को कहते हैं बे-ख़ुदी ख़ुर्शीद ही की आख़िरी मंज़िल तो रात है — Firaq Gorakhpuri
ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त सोच लें और उदास हो जाएँ — Firaq Gorakhpuri
ये न पूछ कितना जिया हूँ मैं ये न पूछ कैसे जिया हूँ मैं कि अबद की आँख भी लग गई मेरे ग़म की शाम-ए-दराज़ में — Firaq Gorakhpuri
हर फ़रेब-ए-ग़म-ए-दुनिया से ख़बरदार तो है तेरा दीवाना किसी काम में हुशियार तो है — Firaq Gorakhpuri
ख़ैर सच तो है सच मगर ऐ झूठ मैं ने तेरा भी ए'तिबार किया — Firaq Gorakhpuri
मैं हूँ दिल है तन्हाई है तुम भी होते अच्छा होता — Firaq Gorakhpuri
बिजली की तरह लचक रहे हैं लच्छे भाई के है बांधी चमकती राखी — Firaq Gorakhpuri
ख़ुश भी हो लेते हैं तेरे बे-क़रार ग़म ही ग़म हो इश्क़ में ऐसा नहीं — Firaq Gorakhpuri
लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी — Firaq Gorakhpuri
बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई — Firaq Gorakhpuri
मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ख़ैर — Firaq Gorakhpuri
बर्क़-ए-फ़ना भी खाए जहाँ ठोकरें 'फ़िराक़' राह-ए-वफ़ा में आते हैं ऐसे मक़ाम भी — Firaq Gorakhpuri
तू याद आया तेरे जौर-ओ-सितम लेकिन न याद आए मोहब्बत में ये मा'सूमी बड़ी मुश्किल से आती है — Firaq Gorakhpuri
दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँँ आई कि जगमगा उठें जिस तरह मंदिरों में चराग़ — Firaq Gorakhpuri
वो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुए बला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जाना — Firaq Gorakhpuri
न कोई वा'दा न कोई यक़ीं न कोई उमीद मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था — Firaq Gorakhpuri
मौत का भी इलाज हो शायद ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं — Firaq Gorakhpuri
सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़' क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया — Firaq Gorakhpuri
अरे सय्याद हमीं गुल हैं हमीं बुलबुल हैं तू ने कुछ आह सुना भी नहीं देखा भी नहीं — Firaq Gorakhpuri

Ghazal

सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में लेकिन उस जल्वा-गह-ए-नाज़ से उठता भी नहीं मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त आह अब मुझ से तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं आज ग़फ़लत भी उन आँखों में है पहले से सिवा आज ही ख़ातिर-ए-बीमार शकेबा भी नहीं बात ये है कि सुकून-ए-दिल-ए-वहशी का मक़ाम कुंज-ए-ज़िंदाँ भी नहीं वुसअ'त-ए-सहरा भी नहीं अरे सय्याद हमीं गुल हैं हमीं बुलबुल हैं तू ने कुछ आह सुना भी नहीं देखा भी नहीं आह ये मज्मा'-ए-अहबाब ये बज़्म-ए-ख़ामोश आज महफ़िल में 'फ़िराक़'-ए-सुख़न-आरा भी नहीं ये भी सच है कि मोहब्बत पे नहीं मैं मजबूर ये भी सच है कि तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं यूँँ तो हंगा में उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क़ मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं फ़ितरत-ए-हुस्न तो मा'लूम है तुझ को हमदम चारा ही क्या है ब-जुज़ सब्र सो होता भी नहीं मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि 'फ़िराक़' है तिरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं आज ग़फ़लत भी उन आँखों में है पहले से सिवा आज ही ख़ातिर-ए-बीमार शकेबा भी नहीं बात ये है कि सुकून-ए-दिल-ए-वहशी का मक़ाम कुंज-ए-ज़िंदाँ भी नहीं वुसअ'त-ए-सहरा भी नहीं अरे सय्याद हमीं गुल हैं हमीं बुलबुल हैं तू ने कुछ आह सुना भी नहीं देखा भी नहीं आह ये मज्मा'-ए-अहबाब ये बज़्म-ए-ख़ामोश आज महफ़िल में 'फ़िराक़'-ए-सुख़न-आरा भी नहीं ये भी सच है कि मोहब्बत पे नहीं मैं मजबूर ये भी सच है कि तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं यूँँ तो हंगा में उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क़ मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं फ़ितरत-ए-हुस्न तो मा'लूम है तुझ को हमदम चारा ही क्या है ब-जुज़ सब्र सो होता भी नहीं मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि 'फ़िराक़' है तिरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं — Firaq Gorakhpuri
हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए छूट जाए तो वही अपना गरेबाँ हो जाए इश्क़ अब भी है वो महरम-ए-बे-गाना-नुमा हुस्न यूँँ लाख छुपे लाख नुमायाँ हो जाए होश-ओ-ग़फ़लत से बहुत दूर है कैफ़िय्यत-ए-इश्क़ उस की हर बे-ख़बरी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ हो जाए याद आती है जब अपनी तो तड़प जाता हूँ मेरी हस्ती तिरा भूला हवा पैमाँ हो जाए आँख वो है जो तिरी जल्वा-गह-ए-नाज़ बने दिल वही है जो सरापा तिरा अरमाँ हो जाए पाक-बाज़ान-ए-मोहब्बत में जो बेबाकी है हुस्न गर उस को समझ ले तो पशेमाँ हो जाए सहल हो कर हुई दुश्वार मोहब्बत तेरी उसे मुश्किल जो बना लें तो कुछ आसाँ हो जाए इश्क़ फिर इश्क़ है जिस रूप में जिस भेस में हो इशरत-ए-वस्ल बने या ग़म-ए-हिज्राँ हो जाए कुछ मुदावा भी हो मजरूह दिलों का ऐ दोस्त मरहम-ए-ज़ख़्म तिरा जौर-पशेमाँ हो जाए ये भी सच है कोई उल्फ़त में परेशाँ क्यूँँ हो ये भी सच है कोई क्यूँँकर न परेशाँ हो जाए इश्क़ को अर्ज़-ए-तमन्ना में भी लाखों पस-ओ-पेश हुस्न के वास्ते इनकार भी आसाँ हो जाए झिलमिलाती है सर-ए-बज़्म-ए-जहाँ शम्अ-ए-ख़ुदी जो ये बुझ जाए चराग़-ए-रह-ए-इरफ़ाँ हो जाए सर-ए-शोरीदा दिया दश्त-ओ-बयाबाँ भी दिए ये मिरी ख़ूबी-ए-क़िस्मत कि वो ज़िंदाँ हो जाए उक़्दा-ए-इश्क़ अजब उक़्दा-ए-मोहमल है 'फ़िराक़' कभी ला-हल कभी मुश्किल कभी आसाँ हो जाए — Firaq Gorakhpuri
तेज़ एहसास-ए-ख़ुदी दरकार है ज़िंदगी को ज़िंदगी दरकार है जो चढ़ा जाए ख़ुमिस्तान-ए-जहाँ हाँ वही लब-तिश्नगी दरकार है देवताओं का ख़ुदा से होगा काम आदमी को आदमी दरकार है सौ गुलिस्ताँ जिस उदासी पर निसार मुझ को वो अफ़्सुर्दगी दरकार है शाएरी है सर-बसर तहज़ीब-ए-क़ल्ब उस को ग़म शाइस्तगी दरकार है शो'ला में लाता है जो सोज़-ओ-गुदाज़ वो ख़ुलूस-ए-बातनी दरकार है ख़ूबी-ए-लफ़्ज़-ओ-बयाँ से कुछ सिवा शाएरी को साहिरी दरकार है क़ादिर-ए-मुतलक़ को भी इंसान की सुनते हैं बे-चारगी दरकार है और होंगे तालिब-ए-मदह-ए-जहाँ मुझ को बस तेरी ख़ुशी दरकार है अक़्ल में यूँँ तो नहीं कोई कमी इक ज़रा दीवानगी दरकार है होश वालों को भी मेरी राय में एक गूना बे-ख़ुदी दरकार है ख़तरा-ए-बिस्यार-दानी की क़सम इल्म में भी कुछ कमी दरकार है दोस्तो काफ़ी नहीं चश्म-ए-ख़िरद इश्क़ को भी रौशनी दरकार है मेरी ग़ज़लों में हक़ाएक़ हैं फ़क़त आप को तो शाएरी दरकार है तेरे पास आया हूँ कहने एक बात मुझ को तेरी दोस्ती दरकार है मैं जफ़ाओं का न करता यूँँ गिला आज तेरी ना-ख़ुशी दरकार है उस की ज़ुल्फ़ आरास्ता-पैरास्ता इक ज़रा सी बरहमी दरकार है ज़िंदा-दिल था ताज़ा-दम था हिज्र में आज मुझ को बे-दिली दरकार है हल्क़ा हल्क़ा गेसु-ए-शब रंग-ए-यार मुझ को तेरी अबतरी दरकार है अक़्ल ने कल मेरे कानों में कहा मुझ को तेरी ज़िंदगी दरकार है तेज़-रौ तहज़ीब-ए-आलम को 'फ़िराक़' इक ज़रा आहिस्तगी दरकार है — Firaq Gorakhpuri
वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें वो इक शख़्स के याद आने की रातें शब-ए-मह की वो ठंडी आँचें वो शबनम तिरे हुस्न के रस्मसाने की रातें जवानी की दोशीज़गी का तबस्सुम गुल-ए-ज़ार के वो खिलाने की रातें फुवारें सी नग़्मों की पड़ती हों जैसे कुछ उस लब के सुनने-सुनाने की रातें मुझे याद है तेरी हर सुब्ह-ए-रुख़्सत मुझे याद हैं तेरे आने की रातें पुर-असरार सी मेरी अर्ज़-ए-तमन्ना वो कुछ ज़ेर-ए-लब मुस्कुराने की रातें सर-ए-शाम से रतजगा के वो सामाँ वो पिछले पहर नींद आने की रातें सर-ए-शाम से ता-सहर क़ुर्ब-ए-जानाँ न जाने वो थीं किस ज़माने की रातें सर-ए-मय-कदा तिश्नगी की वो क़स्में वो साक़ी से बातें बनाने की रातें हम-आग़ोशियाँ शाहिद-ए-मेहरबाँ की ज़माने के ग़म भूल जाने की रातें 'फ़िराक़' अपनी क़िस्मत में शायद नहीं थे ठिकाने के दिन या ठिकाने की रातें — Firaq Gorakhpuri
अब अक्सर चुप चुप से रहें हैं यूँँही कभू लब खोलें हैं पहले 'फ़िराक़' को देखा होता अब तो बहुत कम बोलें हैं दिन में हम को देखने वालो अपने अपने हैं औक़ात जाओ न तुम इन ख़ुश्क आँखों पर हम रातों को रो लें हैं फ़ितरत मेरी इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तंहाई कहने की नौबत ही न आई हम भी किसू के हो लें हैं ख़ुनुक सियह महके हुए साए फैल जाएँ हैं जल-थल पर किन जतनों से मेरी ग़ज़लें रात का जूड़ा खोलें हैं बाग़ में वो ख़्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर डाली डाली नौरस पत्ते सहज सहज जब डोलें हैं उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंदे हाए वो आलम-ए-जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ जब फ़ित्ने पर तौलें हैं नक़्श-ओ-निगार-ए-ग़ज़ल में जो तुम ये शादाबी पाओ हो हम अश्कों में काएनात के नोक-ए-क़लम को डुबो लें हैं इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम हुए है नदीम ख़ल्वत में वो नर्म उँगलियाँ बंद-ए-क़बा जब खोलें हैं ग़म का फ़साना सुनने वालो आख़िर-ए-शब आराम करो कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो लें हैं हम लोग अब तो अजनबी से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-'फ़िराक़' अब तो तुम्हीं को प्यार करें हैं अब तो तुम्हीं से बोलें हैं — Firaq Gorakhpuri
दीदार में इक तुर्फ़ा दीदार नज़र आया हर बार छुपा कोई हर बार नज़र आया छालों को बयाबाँ भी गुलज़ार नज़र आया जब छेड़ पर आमादा हर ख़ार नज़र आया सुब्ह-ए-शब-ए-हिज्राँ की वो चाक-गरेबानी इक आलम-ए-नैरंगी हर तार नज़र आया हो सब्र कि बे-ताबी उम्मीद कि मायूसी नैरंग-ए-मोहब्बत भी बे-कार नज़र आया जब चश्म-ए-सियह तेरी थी छाई हुई दिल पर इस मुल्क का हर ख़ित्ता तातार नज़र आया तू ने भी तो देखी थी वो जाती हुई दुनिया क्या आख़िरी लम्हों में बीमार नज़र आया ग़श खा के गिरे मूसा अल्लाह-री मायूसी हल्का सा वो पर्दा भी दीवार नज़र आया ज़र्रा हो कि क़तरा हो ख़ुम-ख़ाना-ए-हस्ती में मख़मूर नज़र आया सरशार नज़र आया क्या कुछ न हुआ ग़म से क्या कुछ न किया ग़म ने और यूँँ तो हुआ जो कुछ बे-कार नज़र आया ऐ इश्क़ क़सम तुझ को मा'मूरा-ए-आलम की कोई ग़म-ए-फ़ुर्क़त में ग़म-ख़्वार नज़र आया शब कट गई फ़ुर्क़त की देखा न 'फ़िराक़' आख़िर तूल-ए-ग़म-ए-हिज्राँ भी बे-कार नज़र आया — Firaq Gorakhpuri
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो बे-ख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो ये सुकूत-ए-नाज़ ये दिल की रगों का टूटना ख़ामुशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म सुब्ह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो हर रग-ए-दिल वज्द में आती रहे दुखती रहे यूँँही उस के जा-ओ-बेजा नाज़ की बातें करो जौ अदम की जान है जो है पयाम-ए-ज़िंदगी उस सुकूत-ए-राज़ उस आवाज़ की बातें करो इश्क़ रुस्वा हो चला बे-कैफ़ सा बेज़ार सा आज उस की नर्गिस-ए-ग़म्माज़ की बातें करो नाम भी लेना है जिस का इक जहान-ए-रंग-ओ-बू दोस्तो उस नौ-बहार-ए-नाज़ की बातें करो किस लिए उज़्र-ए-तग़ाफुल किस लिए इल्ज़ाम-ए-इश्क़ आज चर्ख़-ए-तफ़रक़ा-पर्वाज़ की बातें करो कुछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा कुछ फ़ज़ा कुछ हसरत-ए-परवाज़ की बातें करो जो हयात-ए-जाविदाँ है जो है मर्ग-ए-ना-गहाँ आज कुछ उस नाज़ उस अंदाज़ की बातें करो इश्क़-ए-बे-परवा भी अब कुछ ना-शकेबा हो चला शोख़ी-ए-हुस्न-ए-करिश्मा-साज़ की बातें करो जिस की फ़ुर्क़त ने पलट दी इश्क़ की काया 'फ़िराक़' आज उस ईसा-नफ़स दम-साज़ की बातें करो — Firaq Gorakhpuri
आज भी क़ाफ़िला-ए-इश्क़ रवाँ है कि जो था वही मील और वही संग-ए-निशाँ है कि जो था फिर तिरा ग़म वही रुस्वा-ए-जहाँ है कि जो था फिर फ़साना ब-हदीस-ए-दिगराँ है कि जो था मंज़िलें गर्द के मानिंद उड़ी जाती हैं वही अंदाज़-ए-जहान-ए-गुज़राँ है कि जो था ज़ुल्मत ओ नूर में कुछ भी न मोहब्बत को मिला आज तक एक धुँदलके का समाँ है कि जो था यूँँ तो इस दौर में बे-कैफ़ सी है बज़्म-ए-हयात एक हंगामा सर-ए-रित्ल-ए-गिराँ है कि जो था लाख कर जौर-ओ-सितम लाख कर एहसान-ओ-करम तुझ पे ऐ दोस्त वही वहम-ओ-गुमाँ है कि जो था आज फिर इश्क़ दो-आलम से जुदा होता है आस्तीनों में लिए कौन-ओ-मकाँ है कि जो था इश्क़ अफ़्सुर्दा नहीं आज भी अफ़्सुर्दा बहुत वही कम कम असर-ए-सोज़-ए-निहाँ है कि जो था नज़र आ जाते हैं तुम को तो बहुत नाज़ुक बाल दिल मिरा क्या वही ऐ शीशा-गिराँ है कि जो था जान दे बैठे थे इक बार हवस वाले भी फिर वही मरहला-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ है कि जो था आज भी सैद-गह-ए-इश्क़ में हुस्न-ए-सफ़्फ़ाक लिए अबरू की लचकती सी कमाँ है कि जो था फिर तिरी चश्म-ए-सुख़न-संज ने छेड़ी कोई बात वही जादू है वही हुस्न-ए-बयाँ है कि जो था रात भर हुस्न पर आए भी गए सौ सौ रंग शाम से इश्क़ अभी तक निगराँ है कि जो था जो भी कर जौर-ओ-सितम जो भी कर एहसान-ओ-करम तुझ पे ऐ दोस्त वही वहम-ओ-गुमाँ है कि जो था आँख झपकी कि इधर ख़त्म हुआ रोज़-ए-विसाल फिर भी इस दिन पे क़यामत का गुमाँ है कि जो था क़ुर्ब ही कम है न दूरी ही ज़ियादा लेकिन आज वो रब्त का एहसास कहाँ है कि जो था तीरा-बख़्ती नहीं जाती दिल-ए-सोज़ाँ की 'फ़िराक़' शम्अ' के सर पे वही आज धुआँ है कि जो था — Firaq Gorakhpuri
आँखों में जो बात हो गई है इक शरह-ए-हयात हो गई है जब दिल की वफ़ात हो गई है हर चीज़ की रात हो गई है ग़म से छुट कर ये ग़म है मुझ को क्यूँँ ग़म से नजात हो गई है मुद्दत से ख़बर मिली न दिल की शायद कोई बात हो गई है जिस शय पे नज़र पड़ी है तेरी तस्वीर-ए-हयात हो गई है अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है दिल में तुझ से थी जो शिकायत अब ग़म के निकात हो गई है इक़रार-ए-गुनाह-ए-इश्क़ सुन लो मुझ से इक बात हो गई है जो चीज़ भी मुझ को हाथ आई तेरी सौग़ात हो गई है क्या जानिए मौत पहले क्या थी अब मेरी हयात हो गई है घटते घटते तिरी इनायत मेरी औक़ात हो गई है उस चश्म-ए-सियह की याद यकसर शाम-ए-ज़ुल्मात हो गई है इस दौर में ज़िंदगी बशर की बीमार की रात हो गई है जीती हुई बाज़ी-ए-मोहब्बत खेला हूँ तो मात हो गई है मिटने लगीं ज़िंदगी की क़द्रें जब ग़म से नजात हो गई है वो चाहें तो वक़्त भी बदल जाए जब आए हैं रात हो गई है दुनिया है कितनी बे-ठिकाना आशिक़ की बरात हो गई है पहले वो निगाह इक किरन थी अब बर्क़-सिफ़ात हो गई है जिस चीज़ को छू दिया है तू ने इक बर्ग-ए-नबात हो गई है इक्का-दुक्का सदा-ए-ज़ंजीर ज़िंदाँ में रात हो गई है एक एक सिफ़त 'फ़िराक़' उस की देखा है तो ज़ात हो गई है — Firaq Gorakhpuri
जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है मेहरबाँ भी कोई हो जाएगा जल्दी क्या है खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है दिल का इक काम जो होता नहीं इक मुद्दत से तुम ज़रा हाथ लगा दो तो हुआ रक्खा है निगह-ए-शोख़ में और दिल में हैं चोटें क्या क्या आज तक हम न समझ पाए कि झगड़ा क्या है इश्क़ से तौबा भी है हुस्न से शिकवे भी हज़ार कहिए तो हज़रत-ए-दिल आप का मंशा क्या है ज़ीनत-ए-दोश तिरा नामा-ए-आमाल न हो तेरी दस्तार से वाइ'ज़ ये लटकता क्या है हाँ अभी वक़्त का आईना दिखाए क्या क्या देखते जाओ ज़माना अभी देखा क्या है न यगाने हैं न बेगाने तिरी महफ़िल में न कोई ग़ैर यहाँ है न कोई अपना है निगह-ए-मस्त को जुम्बिश न हुई गो सर-ए-बज़्म कुछ तो इस जाम-ए-लबा-लब से अभी छलका है रात-दिन फिरती है पलकों के जो साए साए दिल मिरा उस निगह-ए-नाज़ का दीवाना है हम जुदाई से भी कुछ काम तो ले ही लेंगे बे-नियाज़ाना तअ'ल्लुक़ ही छुटा अच्छा है उन से बढ़-चढ़ के तो ऐ दोस्त हैं यादें इन की नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा में तिरी रक्खा क्या है ऐसी बातों से बदलती है कहीं फ़ितरत-ए-हुस्न जान भी दे दे अगर कोई तो क्या होता है तिरी आँखों को भी इनकार तिरी ज़ुल्फ़ को भी किस ने ये इश्क़ को दीवाना बना रक्खा है दिल तिरा जान तिरी आह तिरी अश्क तिरे जो है ऐ दोस्त वो तेरा है हमारा क्या है दर-ए-दौलत पे दुआएँ सी सुनी हैं मैं ने देखिए आज फ़क़ीरों का किधर फेरा है तुझ को हो जाएँगे शैतान के दर्शन वाइ'ज़ डाल कर मुँह को गरेबाँ में कभी देखा है हम कहे देते हैं चालों में न आओ उन की सर्वत-ओ-जाह के इश्वों से बचो धोका है यही गर आँख में रह जाए तो है चिंगारी क़तरा-ए-अश्क जो बह जाए तो इक दरिया है ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ के सिवा नर्गिस-ए-जादू के सिवा दिल को कुछ और बलाओं ने भी आ घेरा है लब-ए-एजाज़ की सौगंद ये झंकार थी क्या तेरी ख़ामोशी के मानिंद अभी कुछ टूटा है दार पर गाह नज़र गाह सू-ए-शहर-ए-निगार कुछ सुनें हम भी तो ऐ इश्क़ इरादा क्या है आ कि ग़ुर्बत-कदा-ए-दहर में जी बहलाएँ ऐ दिल उस जल्वा-गह-ए-नाज़ में क्या रक्खा है ज़ख़्म ही ज़ख़्म हूँ मैं सुब्ह की मानिंद 'फ़िराक़' रात भर हिज्र की लज़्ज़त से मज़ा लूटा है — Firaq Gorakhpuri
कुछ न कुछ इश्क़ की तासीर का इक़रार तो है उस का इल्ज़ाम-ए-तग़ाफ़ुल पे कुछ इनकार तो है हर फ़रेब-ए-ग़म-ए-दुनिया से ख़बर-दार तो है तेरा दीवाना किसी काम में हुश्यार तो है देख लेते हैं सभी कुछ तिरे मुश्ताक़-ए-जमाल ख़ैर दीदार न हो हसरत-ए-दीदार तो है माअ'रके सर हों उसी बर्क़-ए-नज़र से ऐ हुस्न ये चमकती हुई चलती हुई तलवार तो है सर पटकने को पटकता है मगर रुक रुक कर तेरे वहशी को ख़याल-ए-दर-ओ-दीवार तो है इश्क़ का शिकवा-ए-बेजा भी न बे-कार गया न सही जौर मगर जौर का इक़रार तो है तुझ से हिम्मत तो पड़ी इश्क़ को कुछ कहने की ख़ैर शिकवा न सही शुक्र का इज़हार तो है इस में भी राबता-ए-ख़ास की मिलती है झलक ख़ैर इक़रार-ए-मोहब्बत न हो इनकार तो है क्यूँँ झपक जाती है रह रह के तिरी बर्क़-ए-निगाह ये झिजक किस लिए इक कुश्ता-ए-दीदार तो है कई उनवान हैं मम्नून-ए-करम करने के इश्क़ में कुछ न सही ज़िंदगी बे-कार तो है सहर-ओ-शाम सर-ए-अंजुमन-ए-नाज़ न हो जल्वा-ए-हुस्न तो है इश्क़-ए-सियहकार तो है चौंक उठते हैं 'फ़िराक़' आते ही उस शोख़ का नाम कुछ सरासीमगी-ए-इश्क़ का इक़रार तो है — Firaq Gorakhpuri
बस्तियाँ ढूँढ़ रही हैं उन्हें वीरानों में वहशतें बढ़ गईं हद से तिरे दीवानों में निगह-ए-नाज़ न दीवानों न फ़र्ज़ानों में जानकार एक वही है मगर अन-जानों में बज़्म-ए-मय बे-ख़ुद-ओ-बे-ताब न क्यूँँ हो साक़ी मौज-ए-बादा है कि दर्द उठता है पैमानों में मैं तो मैं चौंक उठी है ये फ़ज़ा-ए-ख़ामोश ये सदा कब की सुनी आती है फिर कानों में सैर कर उजड़े दिलों की जो तबीअत है उदास जी बहल जाते हैं अक्सर इन्हीं वीरानों में वुसअतें भी हैं निहाँ तंगी-ए-दिल में ग़ाफ़िल जी बहल जाते हैं अक्सर इन्हीं मैदानों में जान ईमान-ए-जुनूँ सिलसिला जुम्बान-ए-जुनूँ कुछ कशिश-हा-ए-निहाँ जज़्ब हैं वीरानों में ख़ंदा-ए-सुब्ह-ए-अज़ल तीरगी-ए-शाम-ए-अबद दोनों आलम हैं छलकते हुए पैमानों में देख जब आलम-ए-हू को तो नया आलम है बस्तियाँ भी नज़र आने लगीं वीरानों में जिस जगह बैठ गए आग लगा कर उट्ठे गर्मियाँ हैं कुछ अभी सोख़्ता-सामानों में वहशतें भी नज़र आती हैं सर-ए-पर्दा-ए-नाज़ दामनों में है ये आलम न गरेबानों में एक रंगीनी-ए-ज़ाहिर है गुलिस्ताँ में अगर एक शादाबी-ए-पिन्हाँ है बयाबानों में जौहर-ए-ग़ुंचा-ओ-गुल में है इक अंदाज़-ए-जुनूँ कुछ बयाबाँ नज़र आए हैं गरेबानों में अब वो रंग-ए-चमन-ओ-ख़ंदा-ए-गुल भी न रहे अब वो आसार-ए-जुनूँ भी नहीं दीवानों में अब वो साक़ी की भी आँखें न रहीं रिंदों में अब वो साग़र भी छलकते नहीं मय-ख़ानों में अब वो इक सोज़-ए-निहानी भी दिलों में न रहा अब वो जल्वे भी नहीं इश्क़ के काशानों में अब न वो रात जब उम्मीदें भी कुछ थीं तुझ से अब न वो बात ग़म-ए-हिज्र के अफ़्सानों में अब तिरा काम है बस अहल-ए-वफ़ा का पाना अब तिरा नाम है बस इश्क़ के ग़म-ख़ानों में ता-ब-कै वादा-ए-मौहूम की तफ़्सील 'फ़िराक़' शब-ए-फ़ुर्क़त कहीं कटती है इन अफ़्सानों में — Firaq Gorakhpuri
अब दौर-ए-आसमाँ है न दौर-ए-हयात है ऐ दर्द-ए-हिज्र तू ही बता कितनी रात है हर काएनात से ये अलग काएनात है हैरत-सरा-ए-इश्क़ में दिन है न रात है जीना जो आ गया तो अजल भी हयात है और यूँँ तो उम्र-ए-ख़िज़्र भी क्या बे-सबात है क्यूँँ इंतिहा-ए-होश को कहते हैं बे-ख़ुदी ख़ुर्शीद ही की आख़िरी मंज़िल तो रात है हस्ती को जिस ने ज़लज़ला-सामाँ बना दिया वो दिल क़रार पाए मुक़द्दर की बात है ये मुशगाफ़ियाँ हैं गिराँ तब-ए-इश्क़ पर किस को दिमाग़-ए-काविश-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात है तोड़ा है ला-मकाँ की हदों को भी इश्क़ ने ज़िंदान-ए-अक़्ल तेरी तो क्या काएनात है गर्दूं शरार-ए-बर्क़-ए-दिल-ए-बे-क़रार देख जिन से ये तेरी तारों भरी रात रात है गुम हो के हर जगह हैं ज़-ख़ुद रफ़्तगान-ए-इश्क़ उन की भी अहल-ए-कश्फ़-ओ-करामात ज़ात है हस्ती ब-जुज़ फ़ना-ए-मुसलसल के कुछ नहीं फिर किस लिए ये फ़िक्र-ए-क़रार-ओ-सबात है उस जान-ए-दोस्ती का ख़ुलूस-ए-निहाँ न पूछ जिस का सितम भी ग़ैरत-ए-सद-इल्तिफ़ात है यूँँ तो हज़ार दर्द से रोते हैं बद-नसीब तुम दिल दुखाओ वक़्त-ए-मुसीबत तो बात है उनवान ग़फ़लतों के हैं क़ुर्बत हो या विसाल बस फ़ुर्सत-ए-हयात 'फ़िराक़' एक रात है — Firaq Gorakhpuri
अपने ग़म का मुझे कहाँ ग़म है ऐ कि तेरी ख़ुशी मुक़द्दम है आग में जो पड़ा वो आग हुआ हुस्न-ए-सोज़-ए-निहाँ मुजस्सम है उस के शैतान को कहाँ तौफ़ीक़ इश्क़ करना गुनाह-ए-आदम है दिल के धड़कों में ज़ोर-ए-ज़र्ब-ए-कलीम किस क़दर इस हबाब में दम है है वही इश्क़ ज़िंदा-ओ-जावेद जिसे आब-ए-हयात भी सम है इस में ठहराव या सुकून कहाँ ज़िंदगी इंक़लाब-ए-पैहम है इक तड़प मौज-ए-तह-नशीं की तरह ज़िंदगी की बिना-ए-मोहकम है रहती दुनिया में इश्क़ की दुनिया नए उनवान से मुनज़्ज़म है उठने वाली है बज़्म माज़ी की रौशनी कम है ज़िंदगी कम है ये भी नज़्म-ए-हयात है कोई ज़िंदगी ज़िंदगी का मातम है इक मुअ'म्मा है ज़िंदगी ऐ दोस्त ये भी तेरी अदा-ए-मुबहम है ऐ मोहब्बत तू इक अज़ाब सही ज़िंदगी बे तिरे जहन्नम है इक तलातुम सा रंग-ओ-निकहत का पैकर-ए-नाज़ में दमा-दम है फिरने को है रसीली नीम-निगाह आहू-ए-नाज़ माइल-ए-राम है रूप के जोत ज़ेर-ए-पैराहन गुल्सिताँ पर रिदा-ए-शबनम है मेरे सीने से लग के सो जाओ पलकें भारी हैं रात भी कम है आह ये मेहरबानियाँ तेरी शादमानी की आँख पुर-नम है नर्म ओ दोशीज़ा किस क़द्र है निगाह हर नज़र दास्तान-ए-मरयम है मेहर-ओ-मह शोला-हा-ए-साज़-ए-जमाल जिस की झंकार इतनी मद्धम है जैसे उछले जुनूँ की पहली शाम इस अदा से वो ज़ुल्फ़ बरहम है यूँँ भी दिल में नहीं वो पहली उमंग और तेरी निगाह भी कम है और क्यूँँ छेड़ती है गर्दिश-ए-चर्ख़ वो नज़र फिर गई ये क्या कम है रू-कश-ए-सद-हरीम-ए-दिल है फ़ज़ा वो जहाँ हैं अजीब आलम है दिए जाती है लौ सदा-ए-'फ़िराक़' हाँ वही सोज़-ओ-साज़ कम कम है — Firaq Gorakhpuri
'फ़िराक़' इक नई सूरत निकल तो सकती है ब-क़ौल उस आँख के दुनिया बदल तो सकती है तिरे ख़याल को कुछ चुप सी लग गई वर्ना कहानियों से शब-ए-ग़म बहल तो सकती है उरूस-ए-दहर चले खा के ठोकरें लेकिन क़दम क़दम पे जवानी उबल तो सकती है पलट पड़े न कहीं उस निगाह का जादू कि डूब कर ये छुरी कुछ उछल तो सकती है बुझे हुए नहीं इतने बुझे हुए दिल भी फ़सुर्दगी में तबीअ'त मचल तो सकती है अगर तू चाहे तो ग़म वाले शादमाँ हो जाएँ निगाह-ए-यार ये हसरत निकल तो सकती है अब इतनी बंद नहीं ग़म-कदों की भी राहें हवा-ए-कूच-ए-महबूब चल तो सकती है कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है हयात लौ तह-ए-दामान-ए-मर्ग दे उट्ठी हवा की राह में ये शम्अ' जल तो सकती है कुछ और मस्लहत-ए-जज़्ब-ए-इश्क़ है वर्ना किसी से छुट के तबीअ'त सँभल तो सकती है अज़ल से सोई है तक़दीर-ए-इश्क़ मौत की नींद अगर जगाइए करवट बदल तो सकती है ग़म-ए-ज़माना-ओ-सोज़-ए-निहाँ की आँच तो दे अगर न टूटे ये ज़ंजीर गल तो सकती है शरीक-ए-शर्म-ओ-हया कुछ है बद-गुमानी-ए-हुस्न नज़र उठा ये झिजक सी निकल तो सकती है कभी वो मिल न सकेगी मैं ये नहीं कहता वो आँख आँख में पड़ कर बदल तो सकती है बदलता जाए ग़म-ए-रोज़गार का मरकज़ ये चाल गर्दिश-ए-अय्याम चल तो सकती है वो बे-नियाज़ सही दिल मता-ए-हेच सही मगर किसी की जवानी मचल तो सकती है तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है ये ज़ोर-ओ-शोर सलामत तिरी जवानी भी ब-क़ौल इश्क़ के साँचे में ढल तो सकती है सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है हँसी हँसी में लहू थूकते हैं दिल वाले ये सर-ज़मीन मगर ला'ल उगल तो सकती है जो तू ने तर्क-ए-मोहब्बत को अहल-ए-दिल से कहा हज़ार नर्म हो ये बात खल तो सकती है अरे वो मौत हो या ज़िंदगी मोहब्बत पर न कुछ सही कफ़-ए-अफ़सोस मल तो सकती है हैं जिस के बल पे खड़े सरकशों को वो धरती अगर कुचल नहीं सकती निगल तो सकती है हुई है गर्म लहू पी के इश्क़ की तलवार यूँँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है गुज़र रही है दबे पाँव इश्क़ की देवी सुबुक-रवी से जहाँ को मसल तो सकती है हयात से निगह-ए-वापसीं है कुछ मानूस मिरे ख़याल से आँखों में पल तो सकती है न भूलना ये है ताख़ीर हुस्न की ताख़ीर 'फ़िराक़' आई हुई मौत टल तो सकती है — Firaq Gorakhpuri
कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में जुनूँ का नाम उछलता रहा ज़माने में 'फ़िराक़' दौड़ गई रूह सी ज़माने में कहाँ का दर्द भरा था मिरे फ़साने में जुनूँ से भूल हुई दिल पे चोट खाने में 'फ़िराक़' देर अभी थी बहार आने में वो कोई रंग है जो उड़ न जाए ऐ गुल-ए-तर वो कोई बू है जो रुस्वा न हो ज़माने में वो आस्तीं है कोई जो लहू न दे निकले वो कोई हसन है झिझके जो रंग लाने में ये गुल खिले हैं कि चोटें जिगर की उभरी हैं निहाँ बहार थी बुलबुल तिरे तराने में बयान-ए-शम्अ'' है हासिल यही है जलने का फ़ना की कैफ़ियतें देख झिलमिलाने में कसी की हालत-ए-दिल सुन के उठ गईं आँखें कि जान पड़ गई हसरत भरे फ़साने में उसी की शरह है ये उठते दर्द का आलम जो दास्ताँ थी निहाँ तेरे आँख उठाने में ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में हमीं हैं गुल हमीं बुलबुल हमीं हवा-ए-चमन 'फ़िराक़' ख़्वाब ये देखा है क़ैद-ख़ाने में — Firaq Gorakhpuri
समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है शब-ए-फ़ुर्क़त मुझे क्या हो गया है तिरा ग़म क्या है बस ये जानता हूँ कि मेरी ज़िंदगी मुझ से ख़फ़ा है कभी ख़ुश कर गई मुझ को तिरी याद कभी आँखों में आँसू आ गया है हिजाबों को समझ बैठा मैं जल्वा निगाहों को बड़ा धोका हुआ है बहुत दूर अब है दिल से याद तेरी मोहब्बत का ज़माना आ रहा है न जी ख़ुश कर सका तेरा करम भी मोहब्बत को बड़ा धोका रहा है कभी तड़पा गया है दिल तिरा ग़म कभी दिल को सहारा दे गया है शिकायत तेरी दिल से करते करते अचानक प्यार तुझ पर आ गया है जिसे चौंका के तू ने फेर ली आँख वो तेरा दर्द अब तक जागता है जहाँ है मौजज़न रंगीनी-ए-हुस्न वहीं दिल का कँवल लहरा रहा है गुलाबी होती जाती हैं फ़ज़ाएँ कोई इस रंग से शरमा रहा है मोहब्बत तुझ से थी क़ब्ल-अज़-मोहब्बत कुछ ऐसा याद मुझ को आ रहा है जुदा आग़ाज़ से अंजाम से दूर मोहब्बत इक मुसलसल माजरा है ख़ुदा-हाफ़िज़ मगर अब ज़िंदगी में फ़क़त अपना सहारा रह गया है मोहब्बत में 'फ़िराक़' इतना न ग़म कर ज़माने में यही होता रहा है — Firaq Gorakhpuri
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम उस निगाह-ए-आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए वाह-री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम पर्दा-ए-आज़ुर्दगी में थी वो जान-ए-इल्तिफ़ात जिस अदा को रंजिश-ए-बेजा समझ बैठे थे हम क्या कहें उल्फ़त में राज़-ए-बे-हिसी क्यूँँकर खुला हर नज़र को तेरी दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम बे-नियाज़ी को तिरी पाया सरासर सोज़ ओ दर्द तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम इंक़लाब-ए-पय-ब-पय हर गर्दिश ओ हर दौर में इस ज़मीन ओ आसमाँ को क्या समझ बैठे थे हम भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती उस को भी अपनी तबीअ'त का समझ बैठे थे हम साफ़ अलग हम को जुनून-ए-आशिक़ी ने कर दिया ख़ुद को तेरे दर्द का पर्दा समझ बैठे थे हम कान बजते हैं मोहब्बत के सुकूत-ए-नाज़ को दास्ताँ का ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम बातों बातों में पयाम-ए-मर्ग भी आ ही गया उन निगाहों को हयात-अफ़्ज़ा समझ बैठे थे हम अब नहीं ताब-ए-सिपास-ए-हुस्न इस दिल को जिसे बे-क़रार-ए-शिकव-ए-बेजा समझ बैठे थे हम एक दुनिया दर्द की तस्वीर निकली इश्क़ को कोहकन और क़ैस का क़िस्सा समझ बैठे थे हम रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ मानूस-ए-जहाँ होता चला ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम हुस्न को इक हुस्न ही समझे नहीं और ऐ 'फ़िराक़' मेहरबाँ ना-मेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम — Firaq Gorakhpuri
रात भी नींद भी कहानी भी हाए क्या चीज़ है जवानी भी एक पैग़ाम-ए-ज़िंदगानी भी आशिक़ी मर्ग-ए-ना-गहानी भी इस अदा का तिरी जवाब नहीं मेहरबानी भी सरगिरानी भी दिल को अपने भी ग़म थे दुनिया में कुछ बलाएँ थीं आसमानी भी मंसब-ए-दिल ख़ुशी लुटाना है ग़म-ए-पिन्हाँ की पासबानी भी दिल को शोलों से करती है सैराब ज़िंदगी आग भी है पानी भी शाद-कामों को ये नहीं तौफ़ीक़ दिल-ए-ग़म-गीं की शादमानी भी लाख हुस्न-ए-यक़ीं से बढ़ कर है उन निगाहों की बद-गुमानी भी तंगना-ए-दिल-ए-मलूल में है बहर-ए-हस्ती की बे-करानी भी इश्क़-ए-नाकाम की है परछाईं शादमानी भी कामरानी भी देख दिल के निगार-ख़ाने में ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ की है निशानी भी ख़ल्क़ क्या क्या मुझे नहीं कहती कुछ सुनूँ मैं तिरी ज़बानी भी आए तारीख़-ए-इश्क़ में सौ बार मौत के दौर-ए-दरमियानी भी अपनी मासूमियत के पर्दे में हो गई वो नज़र सियानी भी दिन को सूरज-मुखी है वो नौ-गुल रात को है वो रात-रानी भी दिल-ए-बद-नाम तेरे बारे में लोग कहते हैं इक कहानी भी वज़्अ''' करते कोई नई दुनिया कि ये दुनिया हुई पुरानी भी दिल को आदाब-ए-बंदगी भी न आए कर गए लोग हुक्मरानी भी जौर-ए-कम-कम का शुक्रिया बस है आप की इतनी मेहरबानी भी दिल में इक हूक भी उठी ऐ दोस्त याद आई तिरी जवानी भी सर से पा तक सुपुर्दगी की अदा एक अंदाज़-ए-तुर्कमानी भी पास रहना किसी का रात की रात मेहमानी भी मेज़बानी भी हो न अक्स-ए-जबीन-ए-नाज़ कि है दिल में इक नूर-ए-कहकशानी भी ज़िंदगी ऐन दीद-ए-यार 'फ़िराक़' ज़िंदगी हिज्र की कहानी भी — Firaq Gorakhpuri

Nazm

मिरी सदा है गुल-ए-शम्-ए-शाम-ए-आज़ादी सुना रहा हूँ दिलों को पयाम आज़ादी लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी मुझे बक़ा की ज़रूरत नहीं कि फ़ानी हूँ मिरी फ़ना से है पैदा दवाम-ए-आज़ादी जो राज करते हैं जम्हूरियत के पर्दे में उन्हें भी है सर-ओ-सौदा-ए-ख़ाम-ए-आज़ादी बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर यही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादी फ़ज़ा में जलते दिलों से धुआँ सा उठता है अरे ये सुब्ह-ए-ग़ुलामी ये शाम-ए-आज़ादी ये महर-ओ-माह ये तारे ये बाम हफ़्त-अफ़्लाक बहुत बुलंद है इन से मक़ाम-ए-आज़ादी फ़ज़ा-ए-शाम-ओ-सहर में शफ़क़ झलकती है कि जाम में है मय-ए-लाला-फ़ाम-ए-आज़ादी स्याह-ख़ाना-ए-दुनिया की ज़ुल्मतें हैं दो-रंग निहाँ है सुब्ह-ए-असीरी में शाम-ए-आज़ादी सुकूँ का नाम न ले है वो क़ैद-ए-बे-मीआद है पय-ब-पय हरकत में क़याम-ए-आज़ादी ये कारवान हैं पसमाँदगान-ए-मंज़िल के कि रहरवों में यही हैं इमाम-ए-आज़ादी दिलों में अहल-ए-ज़मीं के है नीव उस की मगर क़ुसूर-ए-ख़ुल्द से ऊँचा है बाम-ए-आज़ादी वहाँ भी ख़ाक-नशीनों ने झंडे गाड़ दिए मिला न अहल-ए-दुवल को मक़ाम-ए-आज़ादी हमारे ज़ोर से ज़ंजीर-ए-तीरगी टूटी हमारा सोज़ है माह-ए-तमाम-ए-आज़ादी तरन्नुम-ए-सहरी दे रहा है जो छुप कर हरीफ़-ए-सुब्ह-ए-वतन है ये शाम-ए-आज़ादी हमारे सीने में शो'ले भड़क रहे हैं 'फ़िराक़' हमारी साँस से रौशन है नाम-ए-आज़ादी — Firaq Gorakhpuri