tu yaad aaya tere jaur-o-sitam lekin na yaad aaye | तू याद आया तेरे जौर-ओ-सितम लेकिन न याद आए

  - Firaq Gorakhpuri

तू याद आया तेरे जौर-ओ-सितम लेकिन न याद आए
मोहब्बत में ये मा'सूमी बड़ी मुश्किल से आती है

  - Firaq Gorakhpuri

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    जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है
    मेहरबाँ भी कोई हो जाएगा जल्दी क्या है

    खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
    जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है

    दिल का इक काम जो होता नहीं इक मुद्दत से
    तुम ज़रा हाथ लगा दो तो हुआ रक्खा है

    निगह-ए-शोख़ में और दिल में हैं चोटें क्या क्या
    आज तक हम न समझ पाए कि झगड़ा क्या है

    इश्क़ से तौबा भी है हुस्न से शिकवे भी हज़ार
    कहिए तो हज़रत-ए-दिल आप का मंशा क्या है

    ज़ीनत-ए-दोश तिरा नामा-ए-आमाल न हो
    तेरी दस्तार से वाइ'ज़ ये लटकता क्या है

    हाँ अभी वक़्त का आईना दिखाए क्या क्या
    देखते जाओ ज़माना अभी देखा क्या है

    न यगाने हैं न बेगाने तिरी महफ़िल में
    न कोई ग़ैर यहाँ है न कोई अपना है

    निगह-ए-मस्त को जुम्बिश न हुइ गो सर-ए-बज़्म
    कुछ तो इस जाम-ए-लबा-लब से अभी छलका है

    रात-दिन फिरती है पलकों के जो साए साए
    दिल मिरा उस निगह-ए-नाज़ का दीवाना है

    हम जुदाई से भी कुछ काम तो ले ही लेंगे
    बे-नियाज़ाना तअ'ल्लुक़ ही छुटा अच्छा है

    उन से बढ़-चढ़ के तो ऐ दोस्त हैं यादें इन की
    नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा में तिरी रक्खा क्या है

    ऐसी बातों से बदलती है कहीं फ़ितरत-ए-हुस्न
    जान भी दे दे अगर कोई तो क्या होता है

    तिरी आँखों को भी इंकार तिरी ज़ुल्फ़ को भी
    किस ने ये इश्क़ को दीवाना बना रक्खा है

    दिल तिरा जान तिरी आह तिरी अश्क तिरे
    जो है ऐ दोस्त वो तेरा है हमारा क्या है

    दर-ए-दौलत पे दुआएँ सी सुनी हैं मैं ने
    देखिए आज फ़क़ीरों का किधर फेरा है

    तुझ को हो जाएँगे शैतान के दर्शन वाइ'ज़
    डाल कर मुँह को गरेबाँ में कभी देखा है

    हम कहे देते हैं चालों में न आओ उन की
    सर्वत-ओ-जाह के इश्वों से बचो धोका है

    यही गर आँख में रह जाए तो है चिंगारी
    क़तरा-ए-अश्क जो बह जाए तो इक दरिया है

    ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ के सिवा नर्गिस-ए-जादू के सिवा
    दिल को कुछ और बलाओं ने भी आ घेरा है

    लब-ए-एजाज़ की सौगंद ये झंकार थी क्या
    तेरी ख़ामोशी के मानिंद अभी कुछ टूटा है

    दार पर गाह नज़र गाह सू-ए-शहर-ए-निगार
    कुछ सुनें हम भी तो ऐ इश्क़ इरादा क्या है

    आ कि ग़ुर्बत-कदा-ए-दहर में जी बहलाएँ
    ऐ दिल उस जल्वा-गह-ए-नाज़ में क्या रक्खा है

    ज़ख़्म ही ज़ख़्म हूँ मैं सुब्ह की मानिंद 'फ़िराक़'
    रात भर हिज्र की लज़्ज़त से मज़ा लूटा है
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    Firaq Gorakhpuri
    कोई आया न आएगा लेकिन
    क्या करें गर न इंतिज़ार करें
    Firaq Gorakhpuri
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    ये न पूछ कितना जिया हूँ मैं ये न पूछ कैसे जिया हूँ मैं
    कि अबद की आँख भी लग गई मेरे ग़म की शाम-ए-दराज़ में
    Firaq Gorakhpuri
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    कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
    उस निगाह-ए-आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम

    रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए
    वाह-री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम

    होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी
    इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम

    पर्दा-ए-आज़ुर्दगी में थी वो जान-ए-इल्तिफ़ात
    जिस अदा को रंजिश-ए-बेजा समझ बैठे थे हम

    क्या कहें उल्फ़त में राज़-ए-बे-हिसी क्यूँकर खुला
    हर नज़र को तेरी दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम

    बे-नियाज़ी को तिरी पाया सरासर सोज़ ओ दर्द
    तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम

    इंक़लाब-ए-पय-ब-पय हर गर्दिश ओ हर दौर में
    इस ज़मीन ओ आसमाँ को क्या समझ बैठे थे हम

    भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती
    उस को भी अपनी तबीअ'त का समझ बैठे थे हम

    साफ़ अलग हम को जुनून-ए-आशिक़ी ने कर दिया
    ख़ुद को तेरे दर्द का पर्दा समझ बैठे थे हम

    कान बजते हैं मोहब्बत के सुकूत-ए-नाज़ को
    दास्ताँ का ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम

    बातों बातों में पयाम-ए-मर्ग भी आ ही गया
    उन निगाहों को हयात-अफ़्ज़ा समझ बैठे थे हम

    अब नहीं ताब-ए-सिपास-ए-हुस्न इस दिल को जिसे
    बे-क़रार-ए-शिकव-ए-बेजा समझ बैठे थे हम

    एक दुनिया दर्द की तस्वीर निकली इश्क़ को
    कोह-कन और क़ैस का क़िस्सा समझ बैठे थे हम

    रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ मानूस-ए-जहाँ होता चला
    ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम

    हुस्न को इक हुस्न ही समझे नहीं और ऐ 'फ़िराक़'
    मेहरबाँ ना-मेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम
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    Firaq Gorakhpuri
    हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए
    छूट जाए तो वही अपना गरेबाँ हो जाए

    इश्क़ अब भी है वो महरम-ए-बे-गाना-नुमा
    हुस्न यूँ लाख छुपे लाख नुमायाँ हो जाए

    होश-ओ-ग़फ़लत से बहुत दूर है कैफ़िय्यत-ए-इश्क़
    उस की हर बे-ख़बरी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ हो जाए

    याद आती है जब अपनी तो तड़प जाता हूँ
    मेरी हस्ती तिरा भूला हवा पैमाँ हो जाए

    आँख वो है जो तिरी जल्वा-गह-ए-नाज़ बने
    दिल वही है जो सरापा तिरा अरमाँ हो जाए

    पाक-बाज़ान-ए-मोहब्बत में जो बेबाकी है
    हुस्न गर उस को समझ ले तो पशेमाँ हो जाए

    सहल हो कर हुइ दुश्वार मोहब्बत तेरी
    उसे मुश्किल जो बना लें तो कुछ आसाँ हो जाए

    इश्क़ फिर इश्क़ है जिस रूप में जिस भेस में हो
    इशरत-ए-वस्ल बने या ग़म-ए-हिज्राँ हो जाए

    कुछ मुदावा भी हो मजरूह दिलों का ऐ दोस्त
    मरहम-ए-ज़ख़्म तिरा जौर-पशेमाँ हो जाए

    ये भी सच है कोई उल्फ़त में परेशाँ क्यूँ हो
    ये भी सच है कोई क्यूँकर न परेशाँ हो जाए

    इश्क़ को अर्ज़-ए-तमन्ना में भी लाखों पस-ओ-पेश
    हुस्न के वास्ते इंकार भी आसाँ हो जाए

    झिलमिलाती है सर-ए-बज़्म-ए-जहाँ शम-ए-ख़ुदी
    जो ये बुझ जाए चराग़-ए-रह-ए-इरफाँ हो जाए

    सर-ए-शोरीदा दिया दश्त-ओ-बयाबाँ भी दिए
    ये मिरी ख़ूबी-ए-क़िस्मत कि वो ज़िंदाँ हो जाए

    उक़्दा-ए-इश्क़ अजब उक़्दा-ए-मोहमल है 'फ़िराक़'
    कभी ला-हल कभी मुश्किल कभी आसाँ हो जाए
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    Firaq Gorakhpuri

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