sar-zameen-e-hind par aqwaam-e-aalam ke firaq | सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'

  - Firaq Gorakhpuri

सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'
क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया

  - Firaq Gorakhpuri

Breakup Shayari

Our suggestion based on your choice

    दूरी हुई तो उनसे क़रीब और हम हुए
    ये कैसे फ़ासले थे जो बढ़ने से कम हुए
    Waseem Barelvi
    87 Likes
    मैं तेरे बाद कोई तेरे जैसा ढूँढता हूँ
    जो बेवफ़ाई करे और बेवफ़ा न लगे
    Abbas Tabish
    91 Likes
    सुब्ह तक हिज्र में क्या जानिए क्या होता है
    शाम ही से मिरे क़ाबू में नहीं दिल मेरा
    Jigar Moradabadi
    28 Likes
    अभी तो जान कहता फिर रहा है तू
    तुझे हम हिज्र वाले साल पूछेंगे
    Parul Singh "Noor"
    37 Likes
    लो फिर तिरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
    अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा ना बहुत हुआ
    Ahmad Faraz
    28 Likes
    दबी कुचली हुई सब ख़्वाहिशों के सर निकल आए
    ज़रा पैसा हुआ तो च्यूँटियों के पर निकल आए

    अभी उड़ते नहीं तो फ़ाख़्ता के साथ हैं बच्चे
    अकेला छोड़ देंगे माँ को जिस दिन पर निकल आए
    Read Full
    Mehshar Afridi
    61 Likes
    दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो
    इस बात से हम को क्या मतलब ये कैसे हो ये क्यूँकर हो
    Ibn E Insha
    17 Likes
    सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
    इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा
    Bashir Badr
    79 Likes
    तुम अपने बारे में कुछ देर सोचना छोड़ो
    तो मैं बताऊँ कि तुम किस क़दर अकेले हो
    Waseem Barelvi
    58 Likes
    किसी से दूरी बनाई किसी के पास रहे
    हज़ार कोशिशें कर लीं मगर, उदास रहे
    Sawan Shukla
    46 Likes

More by Firaq Gorakhpuri

As you were reading Shayari by Firaq Gorakhpuri

    आँखों में जो बात हो गई है
    इक शरह-ए-हयात हो गई है

    जब दिल की वफ़ात हो गई है
    हर चीज़ की रात हो गई है

    ग़म से छुट कर ये ग़म है मुझ को
    क्यूँ ग़म से नजात हो गई है

    मुद्दत से ख़बर मिली न दिल की
    शायद कोई बात हो गई है

    जिस शय पे नज़र पड़ी है तेरी
    तस्वीर-ए-हयात हो गई है

    अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह
    उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है

    दिल में तुझ से थी जो शिकायत
    अब ग़म के निकात हो गई है

    इक़रार-ए-गुनाह-ए-इश्क़ सुन लो
    मुझ से इक बात हो गई है

    जो चीज़ भी मुझ को हाथ आई
    तेरी सौग़ात हो गई है

    क्या जानिए मौत पहले क्या थी
    अब मेरी हयात हो गई है

    घटते घटते तिरी इनायत
    मेरी औक़ात हो गई है

    उस चश्म-ए-सियह की याद यकसर
    शाम-ए-ज़ुल्मात हो गई है

    इस दौर में ज़िंदगी बशर की
    बीमार की रात हो गई है

    जीती हुई बाज़ी-ए-मोहब्बत
    खेला हूँ तो मात हो गई है

    मिटने लगीं ज़िंदगी की क़द्रें
    जब ग़म से नजात हो गई है

    वो चाहें तो वक़्त भी बदल जाए
    जब आए हैं रात हो गई है

    दुनिया है कितनी बे-ठिकाना
    आशिक़ की बरात हो गई है

    पहले वो निगाह इक किरन थी
    अब बर्क़-सिफ़ात हो गई है

    जिस चीज़ को छू दिया है तू ने
    इक बर्ग-ए-नबात हो गई है

    इक्का-दुक्का सदा-ए-ज़ंजीर
    ज़िंदाँ में रात हो गई है

    एक एक सिफ़त 'फ़िराक़' उस की
    देखा है तो ज़ात हो गई है
    Read Full
    Firaq Gorakhpuri
    बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
    तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
    Firaq Gorakhpuri
    57 Likes
    आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'
    जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए
    Firaq Gorakhpuri
    27 Likes
    अब अक्सर चुप चुप से रहें हैं यूँही कभू लब खोलें हैं
    पहले 'फ़िराक़' को देखा होता अब तो बहुत कम बोलें हैं

    दिन में हम को देखने वालो अपने अपने हैं औक़ात
    जाओ न तुम इन ख़ुश्क आँखों पर हम रातों को रो लें हैं

    फ़ितरत मेरी इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तंहाई
    कहने की नौबत ही न आई हम भी किसू के हो लें हैं

    ख़ुनुक सियह महके हुए साए फैल जाएँ हैं जल-थल पर
    किन जतनों से मेरी ग़ज़लें रात का जूड़ा खोलें हैं

    बाग़ में वो ख़्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर
    डाली डाली नौरस पत्ते सहज सहज जब डोलें हैं

    उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंदे
    हाए वो आलम-ए-जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ जब फ़ित्ने पर तौलें हैं

    नक़्श-ओ-निगार-ए-ग़ज़ल में जो तुम ये शादाबी पाओ हो
    हम अश्कों में काएनात के नोक-ए-क़लम को डुबो लें हैं

    इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम हुए है नदीम
    ख़ल्वत में वो नर्म उँगलियाँ बंद-ए-क़बा जब खोलें हैं

    ग़म का फ़साना सुनने वालो आख़िर-ए-शब आराम करो
    कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो लें हैं

    हम लोग अब तो अजनबी से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-'फ़िराक़'
    अब तो तुम्हीं को प्यार करें हैं अब तो तुम्हीं से बोलें हैं
    Read Full
    Firaq Gorakhpuri
    खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
    जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है
    Firaq Gorakhpuri
    33 Likes

Similar Writers

our suggestion based on Firaq Gorakhpuri

Similar Moods

As you were reading Breakup Shayari Shayari