dil abhi poori tarah toota nahin | दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं

  - Abdul Hamid Adam

दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए

  - Abdul Hamid Adam

Dil Shayari

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    हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही
    किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही
    Masroor Anwar
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    ये कहते हो तिरे जाने से दिल को चैन आएगा
    तो जाता हूँ, ख़ुदा हाफ़िज़! मगर तुम झूठ कहते हो
    Zubair Ali Tabish
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    न तेरे आने से मेरा शबाब लौटा है
    न दिल लगाने से मेरा शबाब लौटा है

    क़सम ख़ुदा की बताता हूँ राज़ ये तुमको
    नहारी खाने से मेरा शबाब लौटा है
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    Paplu Lucknawi
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    समझे थे हम जिसे ख़लील काबा उसी ने ढा दिया
    Arzoo Lakhnavi
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    निभेगी किस तरह दिल सोचता है
    अजब लड़की है जब देखो ख़फ़ा है
    Fuzail Jafri
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    दिल हारने के बाद ही आता है ये सुख़न
    अब तक किसी ने कोख से शायर नहीं जना
    Anas Khan
    आप चाहें तो कहीं और भी रह सकते हैं
    दिल हमारा है तो मर्ज़ी भी हमारी होगी
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    हम तो कुछ देर हँस भी लेते हैं
    दिल हमेशा उदास रहता है
    Bashir Badr
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    हम मिल के आ गये मगर अच्छा नहीं लगा
    फिर यूँ हुआ असर कि घर अच्छा नहीं लगा

    इक बार दिल में तुझसे जुदाई का डर बना
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    Shriyansh Qaabiz
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    देखिए होगा श्री-कृष्ण का दर्शन क्यूँ-कर
    सीना-ए-तंग में दिल गोपियों का है बेकल
    Mohsin Kakorvi
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    हद से बढ़ कर हसीन लगते हो
    झूटी क़समें ज़रूर खाया करो
    Abdul Hamid Adam
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    हँस हँस के जाम जाम को छलका के पी गया
    वो ख़ुद पिला रहे थे मैं लहरा के पी गया

    तौबा के टूटने का भी कुछ कुछ मलाल था
    थम थम के सोच सोच के शर्मा के पी गया

    साग़र-ब-दस्त बैठी रही मेरी आरज़ू
    साक़ी शफ़क़ से जाम को टकरा के पी गया

    वो दुश्मनों के तंज़ को ठुकरा के पी गए
    मैं दोस्तों के ग़ैज़ को भड़का के पी गया

    सदहा मुतालिबात के बा'द एक जाम-ए-तल्ख़
    दुनिया-ए-जब्र-ओ-सब्र को धड़का के पी गया

    सौ बार लग़्ज़िशों की क़सम खा के छोड़ दी
    सौ बार छोड़ने की क़सम खा के पी गया

    पीता कहाँ था सुब्ह-ए-अज़ल मैं भला 'अदम'
    साक़ी के ए'तिबार पे लहरा के पी गया
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    Abdul Hamid Adam
    गो तिरी ज़ुल्फ़ों का ज़िंदानी हूँ मैं
    भूल मत जाना कि सैलानी हूँ मैं

    ज़िंदगी की क़ैद कोई क़ैद है
    सूखते तालाब का पानी हूँ मैं

    चाँदनी रातों में यारों के बग़ैर
    चाँदनी रातों की वीरानी हूँ मैं

    जिस क़दर मौजूद हूँ मफ़क़ूद हूँ
    जिस क़दर ग़ाएब हूँ लाफ़ानी हूँ मैं

    मुझ को तन्हाई में सुनना बैठ कर
    मुतरिब-ए-लम्हात-ए-वजदानी हूँ मैं

    जिस क़दर करता हूँ अंदेशा 'अदम'
    उस क़दर तस्वीर-ए-हैरानी हूँ मैं

    अक़्ल से क्या काम मुझ नाचीज़ का
    एक मा'मूली सी नादानी हूँ मैं

    हूँ अगर तो हूँ भी क्या इस के सिवा
    क़ीमती विर्से की अर्ज़ानी हूँ मैं

    दिल की धड़कन बढ़ती जाती है 'अदम'
    किस हसीं के ज़ेर-ए-निगरानी हूँ मैं
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    Abdul Hamid Adam
    बढ़ के तूफ़ान को आग़ोश में ले ले अपनी
    डूबने वाले तिरे हाथ से साहिल तो गया
    Abdul Hamid Adam
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    जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं
    ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं

    क्यूँ शिकन डालते हो माथे पर
    भूल कर आ गए हैं जाते हैं

    कश्तियाँ यूँ भी डूब जाती हैं
    नाख़ुदा किस लिए डराते हैं

    इक हसीं आँख के इशारे पर
    क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं
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    Abdul Hamid Adam

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