मैं उस सेे घर जाकर मिलने वाला था
लेकिन आज भी दरवाज़े पे ताला था
जहाँ जहाँ पड़ते थे फूल उग आते थे
क्या तअ'ज्जुब है इन पैरों पर छाला था
बाहर का मंज़र भी धुंधला धुंधला था
खिड़की पर भी मकड़ी का इक जाला था
हाथ उठाए तूने भी किन हाथों पर?
जिन हाथों ने तुझको गोद में पाला था
हिज्र ने हमको उस ज़िंदान में फेंक दिया
रात तो फिर भी रात थी दिन भी काला था
'दर्पन' की आँखों ने सब कुछ बोल दिया
वो मुझ सेे जो राज़ छुपाने वाला था
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