Jameel Malik

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Jameel Malik shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jameel Malik's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तिरी जुस्तुजू में निकले तो अजब सराब देखे कभी शब को दिन कहा है कभी दिन में ख़्वाब देखे — Jameel Malik
मैदाँ में हार जीत का यूँँ फ़ैसला हुआ दुनिया थी उन के साथ हमारा ख़ुदा हुआ — Jameel Malik
हम तो तमाम उम्र तिरी ही अदा रहे ये क्या हुआ कि फिर भी हमीं बे-वफ़ा रहे — Jameel Malik
हम से कोई तअल्लुक़-ए-ख़ातिर तो है उसे वो यार बा-वफ़ा न सही बे-वफ़ा तो है — Jameel Malik
पेड़ का दुख तो कोई पूछने वाला ही न था अपनी ही आग में जलता हुआ साया देखा — Jameel Malik

Ghazal

दिल की दिल ने न कही यूँँ तो कई बार मिले हम शनासा थे मगर सूरत-ए-अग़्यार मिले उस से कहना कि न अब और वो इतरा के चले दोस्तो तुम को अगर यार-ए-तरह-दार मिले बे-वफ़ा हम हैं तो ऐ जान-ए-वफ़ा यूँँही सही ढूँड लेना जो तुम्हें कोई वफ़ादार मिले हम तो दिल दे के भी दुनिया में अकेले ही रहे जो हवस कार थे सब उन के तरफ़-दार मिले दिल की क़ीमत तो मोहब्बत के सिवा कुछ भी न थी जो मिले सूरत-ए-ज़ेबा के ख़रीदार मिले हम ने काँटों को भी सीने से लगा रक्खा है ख़ार भी हम से ब-रंग-ए-गुल-ए-गुलज़ार मिले दूरियाँ फ़ासले हो जाते हैं तय आख़िर-ए-कार सर-ए-गुलज़ार जो बिछड़े थे सर-ए-दार मिले — Jameel Malik
महफ़िलें ख़्वाब हुईं रह गए तन्हा चेहरे वक़्त ने छीन लिए कितने शनासा चेहरे सारी दुनिया के लिए एक तमाशा चेहरे दिल तो पर्दे में रहे हो गए रुस्वा चेहरे तुम वो बे-दर्द कि मुड़ कर भी न देखा उन को वर्ना करते रहे क्या क्या न तक़ाज़ा चेहरे कितने हाथों ने तराशे ये हसीं ताज-महल झाँकते हैं दर-ओ-दीवार से क्या क्या चेहरे सोए पत्तों की तरह जागती कलियों की तरह ख़ाक में गुम तो कभी ख़ाक से पैदा चेहरे ख़ुद ही वीरानी-ए-दिल ख़ुद ही चराग़-ए-महफ़िल कभी महरूम-ए-तमन्ना कभी शैदा चेहरे ख़ाक उड़ती भी रही अब्र बरसता भी रहा हम ने देखे कभी सहरा कभी दरिया-चेहरे यही इमरोज़ भी हंगामा-ए-फ़र्दा भी यही पेश करते रहे हर दौर का नक़्शा चेहरे दीप जलते ही रहे ताक़ पे अरमानों के कितनी सदियों से है हर घर का उजाला चेहरे ख़त्म हो जाएँ जिन्हें देख के बीमारी-ए-दिल ढूँढ़ कर लाएँ कहाँ से वो मसीहा चेहरे दास्ताँ ख़त्म न होगी कभी चेहरों की 'जमील' हुस्न-ए-यूसुफ़ तो कभी इश्क़-ए-ज़ुलेख़ा चेहरे — Jameel Malik
हर घर के आस-पास समुंदर लगा मुझे कितना मुहीब शहर का मंज़र लगा मुझे ख़िल्क़त बहुत थी फिर भी कोई बोलता न था सुनसान रास्तों से बहुत डर लगा मुझे क़ातिल का हाथ आज ख़ुदा के है रू-ब-रू दस्त-ए-दुआ' भी ख़ून का साग़र लगा मुझे यूँँ रेज़ा रेज़ा हूँ कि कोई भी हुआ न था यूँँ तो तिरी निगाह का कंकर लगा मुझे बैठे-बिठाए कूचा-ए-क़ातिल में ले गया मासूम दिल भी कितना सितमगर लगा मुझे किस किस ने चुटकियों में उड़ाया है मेरा दिल चाहे तो तू भी आख़िरी ठोकर लगा मुझे गुलचीं पलट के सब तिरे कूचे से आए हैं फूलों के रास्ते में तिरा घर लगा मुझे वो जागता रहा तो क़यामत बपा रही वो सो गया तो और भी काफ़र लगा मुझे देखा जब आँख भर के उसे डूबता गया आलम तमाम आलम-ए-दीगर लगा मुझे उस की ख़मोशियों में निहाँ कितना शोर था मुझ से सिवा वो दर्द का ख़ूगर लगा मुझे जिस आइने में भी तिरा पैकर समा गया उस आइने में अपना ही जौहर लगा मुझे या मेरे दिल से हसरत-ए-परवाज़ छीन ले या मेरे पास आ के नए पर लगा मुझे साहिल पे जो खड़ा था तमाशा बना हुआ वो गहरे पानियों का शनावर लगा मुझे सोचा तो चूर चूर थे शीशे के घर तमाम देखा तो हाथ हाथ में पत्थर लगा मुझे आँखों से गर्द झाड़ के देखा तो दोस्तो कोताह क़द भी अपने बराबर लगा मुझे तारीकियों में नूर का हाला भी था कहीं दश्त-ए-ख़याल अपना मुक़द्दर लगा मुझे छेड़ी कुछ इस तरह से 'जमील' उस ने ये ग़ज़ल हर एक शे'र क़ंद-ए-मुकर्रर लगा मुझे — Jameel Malik

Nazm

मिरा दिल उछलता समुंदर मिरा जज़्बा-ए-बे-अमाँ मेरा एक एक अरमाँ उछलते समुंदर की सदियों पुरानी चट्टानों से टकरा के यूँँ रेज़ा रेज़ा हुआ है कि घाइल समुंदर के सीने में महशर बपा है हर इक मौज दर्द-आश्ना है हर इक क़तरा-ए-आब अनमोल है गौहर-ए-बे-बहा है मैं हस्ती के साहिल का मबहूत-ओ-हैराँ मुसाफ़िर मिरे ज़र्द चेहरे पे जमती हुई रेत मेरा सरकता हुआ जिस्म सब की निगाहों का मरकज़ बना है मगर कोई ऐसा नहीं कोई भी तो नहीं जो मिरी मुंजमिद गहरी झीलों से गुज़रे मिरे दिल के क़ुल्ज़ुम में उतरे जहाँ की हर इक मौज दर्द-आश्ना है हर इक क़तरा-ए-आब अनमोल है गौहर-ए-बे-बहा है जहाँ रूह तन से जुदा है अज़ल के मुसाफ़िर की मंज़िल अबद है बक़ा है — Jameel Malik