कुछ सपनों को सच होने की ख़्वाइश भारी पड़ती है
कुछ ख़्वाबों पर ताबीरों की बंदिश भारी पड़ती है
कुछ रिश्तों को दो रूहों का ख़ालीपन खा जाता है,
कुछ रिश्तों पर दो जिस्मों की रंजिश भारी पड़ती है
पहले पहले प्यासी दुनिया मर जाती है पानी को ,
फिर जो बारिश होती है वो बारिश भारी पड़ती है
उन आँखों से पूछो जा कर बैचेनी क्या होती है
जिन आँखों को बीनाई की जुम्बिश भारी पड़ती है
तन्हाई में ग़म का साया दिल पर हावी होता है
ऊपर से उस पर अश्कों की गर्दिश भारी पड़ती है
आते आते पानी सर के ऊपर तक आ जाता है,
मल्लाहों पर दरियाओं की साज़िश भारी पड़ती है
'दर्पन' दुनियादारी के सब भेद नहीं खुल सकते हैं
सच के तह तक जाने की हर कोशिश भारी पड़ती है















