Darpan
Darpan
Ghazal

वीराने में रौशन एक दिया छू कर,

रक़्स करूँ मैं तेरे नक़्श-ए-पा छू कर

मुमकिन है उस बुत में कोई रहता हो,
पत्थर जैसा तो नहीं लगा छू कर

दस्तक देने आया था दरवाज़े पर,
लौट गया जो बस मेरा साया छू कर

तब तक कोई हुस्न नहीं खुलता मुझ पर,
जब तक देख नहीं लेता पूरा छू कर

जुगनू , गुलशन, शबनब और चंदन का पेड़,
तुझ को छूने आया हूँ क्या क्या छू कर,

इक बात मेरे दिल को चुभने वाली थी
इक तीर बड़े क़रीब से निकला छू कर

'दर्पन' से ही पूछो उस के दिल का दुख,
चारा-गर क्या खाक़ बताएगा छू कर

— Darpan

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