Darpan

Darpan

@abhas-nalwaya

Abhas Nalwaya Darpan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Abhas Nalwaya Darpan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

28

Content

41

Likes

492

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

ग़ज़ल बनी है ज़िन्दगी, नफ़स नफ़स है शा'इरी, सुख़न से मेरी आशिक़ी , ग़ज़ब है बेमिसाल है — Darpan
इश्क़ में धोखा खाने वाले बिल्कुल भी मायूस न हो इस रस्ते में थोड़ा आगे मयख़ाना भी आता है — Darpan
इश्क़ हमारा चाँद सितारे छू लेगा घुटनों पर आ कर इज़हार किया हम ने — Darpan
उन को दूर किया जाता है जो बरसों के साथी हैं और अनजाने लोगों की आपस में शादी होती है — Darpan
ज़ब्त करो गर ग़म के बादल छाए हैं, रक़्स करो के बारिश आने वाली है — Darpan
एक तितली से वा'दा है सो गुलशन में, ग़लती से भी ख़ार नहीं देखूँगा मैं (ख़ार- काँटे ) — Darpan
बात ज़रा आगे बढ़ सकती है 'दर्पन' अब इक नंबर डायल भी हो सकता है — Darpan
घर आते आते सौदागर हो जाऊँ इतना भी बाज़ार नहीं देखूंगा मैं — Darpan

Ghazal

बदन मरहूम हो जाने पे भी आवाज़ आती है , कफ़न से रूह की इक सरसरी आवाज़ आती है जिसे सुन कर परिंदों के गले भी सूख जाते हैं, शजर के पास ऐसे ज़ब्त की आवाज़ आती है हर इक मंज़र किसी आवाज़ का ही तर्जुमा तो है, पढ़ो तो काग़ज़ों से काग़ज़ी आवाज़ आती है सदा का रब्त गहरी..ठेठ.. गहरी ख़ामुशी से है, ख़ला को सुन के देखा.. वाक़ई.. आवाज़ आती है.. हवेली को तो सब ने मिल के वीराना बना डाला, मगर वो दर जहाँ से आज भी आवाज़ आती है ? वो इक बुत बोलता तो है मगर अपनी सहूलत से, कभी पत्थर का होता है कभी आवाज़ आती है फ़िज़ा से इल्तिजा है अब नई तरतीब से गूँजे, कई बरसों से वो ही आ चुकी आवाज़ आती है.. इबादत में ख़ुदा हो ख़ुश तो 'दर्पन'.. फूल गिरते हैं, ग़ज़ल में मीर तक़ी मीर की आवाज़ आती है — Darpan
तुम ने मुझ सेे इश्क़ किया जब करने को नफ़रत भी थी या'नी मेरे साथ में तुम थी और मेरी किस्मत भी थी फूलों के खिल जाने पर सब पहली बारिश भूल गए बेटों के क़ाबिल होने में माँओं की मेहनत भी थी वक़्त-ए-रुख़सत में हम हँसते थे तो रोना आता था जितनी भी दूरी थी हम में उतनी ही क़ुर्बत भी थी वो लड़का जो सौ नंबर में दो नंबर से चूक गया जिस में सब कुछ अच्छा था पर सिगरेट की आदत भी थी कभी कभी तो वीडियो कॉल पे घण्टों तक खो जाते थे इश्क़ हमें ये याद दिलाता के हम को फुर्रस्त भी थी दर्पन मैं टेरेस पर बैठा वहशत का मारा भी था और फिर बादएसबा उस की यादों से लतपत भी थी दर्पन — Darpan
फ़िज़ाओं को जवाँ फूलों की सोहबत क्यूँँ ज़रूरी है, ये ज़ाती मसअला है पूछना मत क्यूँँ ज़रूरी है सफ़र में मुश्किलों का मोल पहचाना तो ये जानाँ, चराग़ों को हवाओं की ज़रूरत क्यूँँ ज़रूरी है जफ़ा के दायरे पामाल करने से वफ़ा आई, झगड़ने से खुला हमपर मुहब्बत क्यूँँ ज़रूरी है क़फ़स में क़ैद इक चिड़िया को देखा तब समझ आया, हमारे ख़ून में आख़िर बग़ावत क्यूँँ ज़रूरी है नसीहत दे रहे हैं सब ये ऐसा हो वो वैसा हो, सियाने हैं सब इतने तो अदालत क्यूँँ ज़रूरी है बताएगा तुम्हें 'दर्पन' उसे तुम पूछ के देखो, ज़माने से भला ख़ुद की हिफाज़त क्यूँँ ज़रूरी है — Darpan
सुनते ही रोने लगती है सर रख कर वो शाने पर, लानत है और भर भर के लानत है ऐसे गाने पर.. चलते फिरते देख लिया था एक हसीना को उस ने, मत पूछो इस के आगे क्या गुज़री उस दीवाने पर दिल में रह कर दिल को ही दुख देते हैं,ग़म देते हैं रोक लगाओ ऐसे मेहमानों के आने जाने पर.. कमतर जाम उतरता है बोतल में भी आँखों में भी, किस ज़ालिम की नज़र पड़ी है अब के इस मय-ख़ाने पर शश..शश.. चुप हो जाओ ये गूंगे-बहरों की महफ़िल है, गला दबोचा जाएगा इस महफ़िल में चिल्लाने पर .. जाने कितने खाने वालों के हक़ का खाता है वो, किस खाने वाले का नाम लिखा है दाने दाने पर? 'दर्पन' इन रस्तों से वापिस भी आना पड़ सकता है, भूल न जाना तुम इन रस्तों को मंज़िल के आने पर .. ❤️🌻 — Darpan
चाहे कैसा भी मौसम हो सब्ज़ नहीं होता हूँ मैं इस जंगल में अपने जैसा इकलौता पौधा हूँ मैं पहली दो से तीन दफ़ा ये दुनिया मुझ पर खुलती है दुनिया पर तो लगभग चौथी दस्तक पे खुलता हूँ मैं बस दुख में शामिल नइ होता ग़मगुसार भी होता हूँ रोता हूँ तो रोते रोते हिम्मत भी देता हूँ मैं तुम को जितना लगता है मैं उतना भी मसरूफ़ नहीं तुम ने मुझ को याद किया तो ये देखो आया हूँ मैं एक मुहब्बत का अफ़साना मंज़िल को ना छू पाया एक सफ़र पे हम निकले थे पर वापस लौटा हूँ मैं मैं अपने कुनबे की उस ख़ालिस मिट्टी का वारिस हूँ कूज़ा-गर कहता है बन और ख़ुद ही बन जाता हूँ मैं मैं ने अपनी ज़दस बाहर का वो मंज़र देख लिया सालों से घर में बैठा हूँ इतना खौफ़ ज़दा हूँ मैं दर्पन फूलों की ख़ातिर-दारी में सहरा मत भूलो तुम को बस ये याद दिलाने सहरा से आया हूँ मैं — Darpan
सब मिलने वालों में इक ऐसा भी मिलने वाला था, जो मुझ को कुछ और ज़ियादा तन्हा कर के जाता था दुख भी ऐसा ज़ाती दुख के कोई और न था शामिल, दुश्मन भी ऐसा दुश्मन के मेरा ख़ुद का साया था, धुंध अगर छटती भी थी तो आँख ज़रा सी खुलती थी, कैसे कह दूँ मैं ने जिस को देखा उस को देखा था उस को हिम्मत देने वाले ख़ुद हो जाते थे मायूस, इतना अफ़सुर्दा चेहरा था देख के रोना आता था लानत.. लानत.. लानत है हम ऐसे ज़िद्दी लोगों पर, जग ज़ाहिर था इश्क़ बला है फिर भी हम को करना था 'दर्पन' उन आँखों में अब इक दहशत क़ाएम रहती है , जिन आँखों में जीने का इक जज़्बा क़ाएम रहता था — Darpan
साहिल से तो हर दरिया का पानी गहरा दिखता है, अंदर जा कर देखो भाई, बाहरस क्या दिखता है ? आँखों पर पट्टी बंधी है वो भी ऐसे बंधी है, सब को लगता है अँधा हूँ जबके पूरा दिखता है इक लड़की से मैं ने पूछा, बता बता कैसा दिखता हूँ? सौ सौ नुक्स निकाले और फिर बोली अच्छा दिखता है मुझ को अपने पास बिठाकर मेरी मुश्किल समझो यार, दूर खड़े होकर मत बोलो- "पागल लड़का दिखता है" कभी कभी गार्डन के दरवाज़े पे याद आती है वो, और फिर सारे फूलों में उस का ही चेहरा दिखता है जैसे देख रहे थे अब तक वैसे नइ.. ऐसे देखो, देखा!!.. बोला था ना मैं ने ऐसे बढ़िया दिखता है 'दर्पन' इस रस्ते पे तुम इक ऐसा दरिया देखोगे, जिस दरिया में डूबो तो आगे का रस्ता दिखता है 'दर्पन' — Darpan
कुछ सपनों को सच होने की ख़्वाइश भारी पड़ती है कुछ ख़्वाबों पर ताबीरों की बंदिश भारी पड़ती है कुछ रिश्तों को दो रूहों का ख़ालीपन खा जाता है, कुछ रिश्तों पर दो जिस्मों की रंजिश भारी पड़ती है पहले पहले प्यासी दुनिया मर जाती है पानी को , फिर जो बारिश होती है वो बारिश भारी पड़ती है उन आँखों से पूछो जा कर बैचेनी क्या होती है जिन आँखों को बीनाई की जुम्बिश भारी पड़ती है तन्हाई में ग़म का साया दिल पर हावी होता है ऊपर से उस पर अश्कों की गर्दिश भारी पड़ती है आते आते पानी सर के ऊपर तक आ जाता है, मल्लाहों पर दरियाओं की साज़िश भारी पड़ती है 'दर्पन' दुनियादारी के सब भेद नहीं खुल सकते हैं सच के तह तक जाने की हर कोशिश भारी पड़ती है — Darpan
इक दुनिया में पूरी दुनिया की आबादी होती है, इक दुनिया में मैं होता हूँ इक शहज़ादी होती है उन को दूर किया जाता है जो बरसों के साथी हैं, और अनजाने लोगों की आपस में शादी होती है पंछी ज़िंदा खौफ़ लिए उड़ता है दूर दराज़ों तक पिंजरे के खुल जाने से कैसे आज़ादी होती है? देखो कितने ख़ुश हैं आशिक़ जो पहले ये कहते थे, इश्क़ मुहब्बत के चक्कर में बस बर्बादी होती है वीर जवानों के जज़्बों की गाथाएं ही अमृत हैं जिन को बस सुन लेने से छाती फ़ौलादी होती है 'दर्पन' को अब रोना धोना सुनने की आदत सी है जो भी मिलता है उस की फितरत फरियादी होती है दर्पन © — Darpan