chahe kaisa bhi mausam ho sabz nahin hota hooñ main | चाहे कैसा भी मौसम हो सब्ज़ नहीं होता हूँ मैं

  - Darpan

चाहे कैसा भी मौसम हो सब्ज़ नहीं होता हूँ मैं
इस जंगल में अपने जैसा इकलौता पौधा हूँ मैं

पहली दो से तीन दफ़ा ये दुनिया मुझपर खुलती है
दुनिया पर तो लगभग चौथी दस्तक पे खुलता हूँ मैं

बस दुःख में शामिल नइ होता ग़मगुसार भी होता हूँ
रोता हूँ तो रोते रोते हिम्मत भी देता हूँ मैं

तुमको जितना लगता है मैं उतना भी मसरूफ़ नहीं
तुमने मुझको याद किया तो ये देखो आया हूँ मैं

एक मुहब्बत का अफ़साना मंज़िल को ना छू पाया
एक सफ़र पे हम निकले थे पर वापस लौटा हूँ मैं

मैं अपने कुनबे की उस ख़ालिस मिट्टी का वारिस हूँ
कूज़ागर कहता है बन और ख़ुद ही बन जाता हूँ मैं

मैंने अपनी ज़दस बाहर का वो मंज़र देख लिया
सालों से घर में बैठा हूँ इतना खौफ़ ज़दा हूँ मैं

दर्पन फूलों की ख़ातिर-दारी में सहरा मत भूलो
तुमको बस ये याद दिलाने सहरा से आया हूँ मैं

  - Darpan

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