चाहे कैसा भी मौसम हो सब्ज़ नहीं होता हूँ मैं
इस जंगल में अपने जैसा इकलौता पौधा हूँ मैं
पहली दो से तीन दफ़ा ये दुनिया मुझ पर खुलती है
दुनिया पर तो लगभग चौथी दस्तक पे खुलता हूँ मैं
बस दुख में शामिल नइ होता ग़मगुसार भी होता हूँ
रोता हूँ तो रोते रोते हिम्मत भी देता हूँ मैं
तुम को जितना लगता है मैं उतना भी मसरूफ़ नहीं
तुम ने मुझ को याद किया तो ये देखो आया हूँ मैं
एक मुहब्बत का अफ़साना मंज़िल को ना छू पाया
एक सफ़र पे हम निकले थे पर वापस लौटा हूँ मैं
मैं अपने कुनबे की उस ख़ालिस मिट्टी का वारिस हूँ
कूज़ा-गर कहता है बन और ख़ुद ही बन जाता हूँ मैं
मैं ने अपनी ज़दस बाहर का वो मंज़र देख लिया
सालों से घर में बैठा हूँ इतना खौफ़ ज़दा हूँ मैं
दर्पन फूलों की ख़ातिर-दारी में सहरा मत भूलो
तुम को बस ये याद दिलाने सहरा से आया हूँ मैं















