सब मिलने वालों में इक ऐसा भी मिलने वाला था,
जो मुझ को कुछ और ज़ियादा तन्हा कर के जाता था
दुख भी ऐसा ज़ाती दुख के कोई और न था शामिल,
दुश्मन भी ऐसा दुश्मन के मेरा ख़ुद का साया था,
धुंध अगर छटती भी थी तो आँख ज़रा सी खुलती थी,
कैसे कह दूँ मैं ने जिस को देखा उस को देखा था
उस को हिम्मत देने वाले ख़ुद हो जाते थे मायूस,
इतना अफ़सुर्दा चेहरा था देख के रोना आता था
लानत.. लानत.. लानत है हम ऐसे ज़िद्दी लोगों पर,
जग ज़ाहिर था इश्क़ बला है फिर भी हम को करना था
'दर्पन' उन आँखों में अब इक दहशत क़ाएम रहती है ,
जिन आँखों में जीने का इक जज़्बा क़ाएम रहता था
— Darpan















