Darpan
Darpan
Ghazal

गिर गिर कर अपने पैरों पर खड़े हुए हैं

तंग फ़िज़ाओं की सोहबत में बड़े हुए हैं

इस से ही अंदाज़ा हो मुश्किल का अपनी
कैसे हम उन के क़दमों में पड़े हुए है

भारी मन से दरवाज़ा खोला है उस ने
फूल मिले हैं लेकिन सारे सड़े हुए हैं

ज़ुल्फ नहीं है एक फ़रिश्ते का साया है
हुस्न नहीं है चाँद पे तारे जड़े हुए हैं

आस पास का सारा मंज़र धुंधला सा है
नैन हमारे इस शिद्द्त से लड़े हुए हैं

दर्पन रोज़ हम एक दर से ख़ारिज होते हैं
लेकिन फिर भी अपनी ज़िद पर अड़े हुए हैं

Darpan

— Darpan

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