बेहद सर-बस्ता है मुझ ग़ाफ़िल का दुख,
लोग नहीं समझेंगे मेरे दिल का दुख
तुम ने बस रस्तों की मुश्किल देखी है,
हम लोगों ने देखा है मंज़िल का दुख
खा जाता है लुत्फ़-ऐ-अहद-ऐ-हाज़िर को
माज़ी का हो या हो मुस्तक़बिल का दुख
दरियाओं को सोचता है , सर नोचता है
सोचो कैसा होता है साहिल का दुख
जब मुझ से कुछ अरमानों का क़त्ल हुआ,
तब जा कर जानाँ मैं ने क़ातिल का दुख
मैं तो बस कुछ शे'र सुनाने आया था,
अब आँखों में है अहल-ऐ-महफ़िल का दुख
'दर्पन' दुख में भी कोई हँसता है क्या?
तुम पर रक़्सीदा है किस जाहिल का दुख
— Darpan















