Darpan
Darpan
Ghazal

मन कम है लेकिन फिर भी.. हँस देता हूँ

हँसना ही गर हल है जी , हँस देता हूँ..

कभी-कभी तो मुझ को ग़ुस्सा आता है,
उस
में भी मैं कभी-कभी हँस देता हूँ

ये मेरी ख़ूबी है या फिर कमज़ोरी?
रोते-रोते बीच में ही हँस देता हूँ

सब नाराज़ी मिट्टी में मिल जाती है ,
वो बस कहती है सोरी , हँस देता हूँ

कितनो को इस बात पे रोना आता है,
ये जो मैं यूँ घड़ी-घड़ी हँस देता हूँ

दुनिया जैसे कोई जुमला हो दर्पन,
जब 'दुनिया' बोले कोई , हँस देता हूँ ..

दर्पन 🌻

— Darpan

More by Darpan

Other ghazal from the same pen

See all from Darpan →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling