खिड़की खोलो साँसे घुंटती है मन में,
एक परिंदा मरने वाला है वन में
दिल में तुम ऐसे रहती हो जान-ऐ-मन,
जैसे तुलसी का पौधा हो आंगन में
आज तलक उस का ग़म होता है मुझ को,
एक खिलौना टूट गया था बचपन में
नाम मेरा ले कर एक दिन मर जाएगा,
दुश्मन जैसा क्या है मेरे दुश्मन में
जाने वाला अक्स यहीं पर छोड़ गया,
और मुझे भी छोड़ गया है उलझन में
दुनिया जो है एक बेवा की सूरत है,
दुल्हन बनकर झाँक रही है चिलमन में
वो जिस की आँखों में 'दर्पन' दिखता है,
उस ने ऐसा क्या देखा था दर्पन में
— Darpan















