न हुआ नसीब क़रार-ए-जाँ हवस-ए-क़रार भी अब नहींतिरा इंतिज़ार बहुत किया तिरा इंतिज़ार भी अब नहींतुझे क्या ख़बर मह-ओ-साल ने हमें कैसे ज़ख़्म दिए यहाँतिरी यादगार थी इक ख़लिश तिरी यादगार भी अब नहीं— Jaun Elia