Javed Akhtar

Javed Akhtar

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Mumbai· India

Javed Akhtar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Javed Akhtar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

क्यूँँ मेरे साथ कोई और परेशान रहे मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे — Javed Akhtar
ये ज़िंदगी भी अजब कारोबार है कि मुझे ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का — Javed Akhtar
वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का — Javed Akhtar
मुझे मायूस भी करती नहीं है यही आदत तिरी अच्छी नहीं है — Javed Akhtar
मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है — Javed Akhtar
मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ — Javed Akhtar
सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है हर घर में बस एक ही कमरा कम है — Javed Akhtar
मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी — Javed Akhtar
तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है — Javed Akhtar
मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँँ हारा — Javed Akhtar
हमें जब से मोहब्बत हो गई है ये दुनिया ख़ूब-सूरत हो गई है — Javed Akhtar
क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा — Javed Akhtar
नेकी इक दिन काम आती है हम को क्या समझाते हो हम ने बे-बस मरते देखे कैसे प्यारे प्यारे लोग — Javed Akhtar
फिर ख़मोशी ने साज़ छेड़ा है फिर ख़यालात ने ली अँगड़ाई — Javed Akhtar
ख़ून से सींची है मैं ने जो ज़मीं मर मर के वो ज़मीं एक सितम-गर ने कहा उस की है — Javed Akhtar
कल जहाँ दीवार थी है आज इक दर देखिए क्या समाई थी भला दीवाने के सर देखिए — Javed Akhtar
अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का — Javed Akhtar
तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो — Javed Akhtar
याद उसे भी एक अधूरा अफ़्साना तो होगा कल रस्ते में उस ने हम को पहचाना तो होगा — Javed Akhtar
धुआँ जो कुछ घरों से उठ रहा है न पूरे शहर पर छाए तो कहना — Javed Akhtar

Ghazal

फिरते हैं कब से दर-ब-दर अब इस नगर अब उस नगर इक दूसरे के हम-सफ़र मैं और मिरी आवारगी ना-आश्ना हर रह-गुज़र ना-मेहरबाँ हर इक नज़र जाएँ तो अब जाएँ किधर मैं और मिरी आवारगी हम भी कभी आबाद थे ऐसे कहाँ बर्बाद थे बे-फ़िक्र थे आज़ाद थे मसरूर थे दिल-शाद थे वो चाल ऐसी चल गया हम बुझ गए दिल जल गया निकले जला के अपना घर मैं और मिरी आवारगी जीना बहुत आसान था इक शख़्स का एहसान था हम को भी इक अरमान था जो ख़्वाब का सामान था अब ख़्वाब है नय आरज़ू अरमान है नय जुस्तुजू यूँँ भी चलो ख़ुश हैं मगर मैं और मिरी आवारगी वो माह-वश वो माह-रू वो माह-काम-ए-हू-ब-हू थीं जिस की बातें कू-ब-कू उस से अजब थी गुफ़्तुगू फिर यूँँ हुआ वो खो गई तो मुझ को ज़िद सी हो गई लाएँगे उस को ढूँड कर मैं और मिरी आवारगी ये दिल ही था जो सह गया वो बात ऐसी कह गया कहने को फिर क्या रह गया अश्कों का दरिया बह गया जब कह के वो दिलबर गया तेरे लिए मैं मर गया रोते हैं उस को रात भर मैं और मिरी आवारगी अब ग़म उठाएँ किस लिए आँसू बहाएँ किस लिए ये दिल जलाएँ किस लिए यूँँ जाँ गंवाएँ किस लिए पेशा न हो जिस का सितम ढूँडेंगे अब ऐसा सनम होंगे कहीं तो कार-गर मैं और मिरी आवारगी आसार हैं सब खोट के इम्कान हैं सब चोट के घर बंद हैं सब गोट के अब ख़त्म हैं सब टोटके क़िस्मत का सब ये फेर है अंधेर है अंधेर है ऐसे हुए हैं बे-असर मैं और मिरी आवारगी जब हमदम-ओ-हमराज़ था तब और ही अंदाज़ था अब सोज़ है तब साज़ था अब शर्म है तब नाज़ था अब मुझ से हो तो हो भी क्या है साथ वो तो वो भी क्या इक बे-हुनर इक बे-समर मैं और मिरी आवारगी — Javed Akhtar
किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ शे'र की मैं तहज़ीब निभाऊँ या अपने हालात लिखूँ ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ कैसे लिखूँ मैं चाँद के क़िस्से कैसे लिखूँ मैं फूल की बात रेत उड़ाए गर्म हवा तो कैसे मैं बरसात लिखूँ किस किस की आँखों में देखे मैं ने ज़हर बुझे ख़ंजर ख़ुद से भी जो मैं ने छुपाए कैसे वो सदमात लिखूँ तख़्त की ख़्वाहिश लूट की लालच कमज़ोरों पर ज़ुल्म का शौक़ लेकिन उन का फ़रमाना है मैं इन को जज़्बात लिखूँ क़ातिल भी मक़्तूल भी दोनों नाम ख़ुदा का लेते थे कोई ख़ुदा है तो वो कहाँ था मेरी क्या औक़ात लिखूँ अपनी अपनी तारीकी को लोग उजाला कहते हैं तारीकी के नाम लिखूँ तो क़ौ में फ़िरक़े ज़ात लिखूँ जाने ये कैसा दौर है जिस में जुरअत भी तो मुश्किल है दिन हो अगर तो उस को लिखूँ दिन रात अगर हो रात लिखूँ — Javed Akhtar
शहर के दुकाँ-दारो कारोबार-ए-उल्फ़त में सूद क्या ज़ियाँ क्या है तुम न जान पाओगे दिल के दाम कितने हैं ख़्वाब कितने महँगे हैं और नक़्द-ए-जाँ क्या है तुम न जान पाओगे कोई कैसे मिलता है फूल कैसे खिलता है आँख कैसे झुकती है साँस कैसे रुकती है कैसे रह निकलती है कैसे बात चलती है शौक़ की ज़बाँ क्या है तुम न जान पाओगे वस्ल का सुकूँ क्या है हिज्र का जुनूँ क्या है हुस्न का फ़ुसूँ क्या है इश्क़ का दरूँ क्या है तुम मरीज़-ए-दानाई मस्लहत के शैदाई राह-ए-गुम-रहाँ क्या है तुम न जान पाओगे ज़ख़्म कैसे फलते हैं दाग़ कैसे जलते हैं दर्द कैसे होता है कोई कैसे रोता है अश्क क्या है नाले क्या दश्त क्या है छाले क्या आह क्या फ़ुग़ाँ क्या है तुम न जान पाओगे ना-मुराद दिल कैसे सुब्ह-ओ-शाम करते हैं कैसे ज़िंदा रहते हैं और कैसे मरते हैं तुम को कब नज़र आई ग़म-ज़दों की तन्हाई ज़ीस्त बे-अमाँ क्या है तुम न जान पाओगे जानता हूँ मैं तुम को ज़ौक़-ए-शाएरी भी है शख़्सियत सजाने में इक ये माहरी भी है फिर भी हर्फ़ चुनते हो सिर्फ़ लफ़्ज़ सुनते हो उन के दरमियाँ क्या है तुम न जान पाओगे — Javed Akhtar

Nazm

वो जो कहलाता था दीवाना तिरा वो जिसे हिफ़्ज़ था अफ़्साना तिरा जिस की दीवारों पे आवेज़ां थीं तस्वीरें तिरी वो जो दोहराता था तक़रीरें तिरी वो जो ख़ुश था तिरी ख़ुशियों से तिरे ग़म से उदास दूर रह के जो समझता था वो है तेरे पास वो जिसे सज्दा तुझे करने से इनकार न था उस को दर-अस्ल कभी तुझ से कोई प्यार न था उस की मुश्किल थी कि दुश्वार थे उस के रस्ते जिन पे बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर घूमते रहज़न थे सदा उस की अना के दर पे उस ने घबरा के सब अपनी अना की दौलत तेरी तहवील में रखवा दी थी अपनी ज़िल्लत को वो दुनिया की नज़र और अपनी भी निगाहों से छुपाने के लिए कामयाबी को तिरी तिरी फ़ुतूहात तिरी इज़्ज़त को वो तिरे नाम तिरी शोहरत को अपने होने का सबब जानता था है वजूद उस का जुदा तुझ से ये कब मानता था वो मगर पुर-ख़तर रास्तों से आज निकल आया है वक़्त ने तेरे बराबर न सही कुछ न कुछ अपना करम उस पे भी फ़रमाया है अब उसे तेरी ज़रूरत ही नहीं जिस का दावा था कभी अब वो अक़ीदत ही नहीं तेरी तहवील में जो रक्खी थी कल उस ने अना आज वो माँग रहा है वापस बात इतनी सी है ऐ साहिब-ए-नाम-ओ-शोहरत जिस को कल तेरे ख़ुदा होने से इनकार न था वो कभी तेरा परस्तार न था — Javed Akhtar
मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ ये काएनात और इस की वुसअत तमाम हैरत तमाम हैरत ये क्या तमाशा ये क्या समाँ है ये क्या अयाँ है ये क्या निहाँ है अथाह साग़र है इक ख़ला का न जाने कब से न जाने कब तक कहाँ तलक है हमारी नज़रों की इंतिहा है जिसे समझते हैं हम फ़लक है ये रात का छलनी छलनी सा काला आसमाँ है कि जिस में जुगनू की शक्ल में बे-शुमार सूरज पिघल रहे हैं शहाब-ए-साक़िब है या हमेशा की ठंडी काली फ़ज़ाओं में जैसे आग के तीर चल रहे हैं करोड़-हा नूरी बरसों के फ़ासलों में फैली ये कहकशाएँ ख़ला घेरे हैं या ख़लाओं की क़ैद में है ये कौन किस को लिए चला है हर एक लम्हा करोड़ों मीलों की जो मसाफ़त है इन को आख़िर कहाँ है जाना अगर है इन का कहीं कोई आख़िरी ठिकाना तो वो कहाँ है जहाँ कहीं है सवाल ये है वहाँ से आगे कोई ज़मीं है कोई फ़लक है अगर नहीं है तो ये नहीं कितनी दूर तक है मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ ये काएनात और इस की वुसअत तमाम हैरत तमाम हैरत सितारे जिन की सफ़ीर किरनें करोड़ों बरसों से राह में है ज़मीं से मिलने की चाह में है कभी तो आ के करेंगी ये मेरी आँखें रौशन कभी तो आएगी मेरे हाथों में रौशनी का एक ऐसा दामन कि जिस को था में मैं जा के देखूँगा इन ख़लाओं के फैले आँगन कभी तो मुझ को ये काएनात अपने राज़ खुल के सुना ही देगी ये अपना आग़ाज़ अपना अंजाम मुझ को इक दिन बता ही देगी अगर कोई वाइज़ अपने मिम्बर से नख़वत-आमेज़ लहज़े में ये कहे कि तुम तो कभी समझ ही नहीं सकोगे कि इस क़दर है ये बात गहरी तो कोई पूछे जो मैं न समझा तो कौन समझाएगा और जिस को कभी न कोई समझ सके ऐसी बात तो फिर फ़ुज़ूल ठहरी — Javed Akhtar
जब वो कम-उम्र ही था उस ने ये जान लिया था कि अगर जीना है बड़ी चालाकी से जीना होगा आँख की आख़िरी हद तक है बिसात-ए-हस्ती और वो मामूली सा इक मोहरा है एक इक ख़ाना बहुत सोच के चलना होगा बाज़ी आसान नहीं थी उस की दूर तक चारों तरफ़ फैले थे मोहरे जल्लाद निहायत ही सफ़्फ़ाक सख़्त बे-रहम बहुत ही चालाक अपने क़ब्ज़े में लिए पूरी बिसात उस के हिस्से में फ़क़त मात लिए वो जिधर जाता उसे मिलता था हर नया ख़ाना नई घात लिए वो मगर बचता रहा चलता रहा एक घर दूसरा घर तीसरा घर पास आया कभी औरों के कभी दूर हुआ वो मगर बचता रहा चलता रहा गो कि मामूली सा मुहरा था मगर जीत गया यूँँ वो इक रोज़ बड़ा मुहरा बना अब वो महफ़ूज़ है इक ख़ाने में इतना महफ़ूज़ है इक ख़ाने में इतना महफ़ूज़ कि दुश्मन तो अलग दोस्त भी पास नहीं आ सकते उस के इक हाथ में है जीत उस की दूसरे हाथ में तन्हाई है — Javed Akhtar
किसी का हुक्म है सारी हवाएँ हमेशा चलने से पहले बताएँ कि उन की सम्त क्या है किधर जा रही हैं हवाओं को बताना ये भी होगा चलेंगी अब तो क्या रफ़्तार होगी हवाओं को ये इजाज़त नहीं है कि आँधी की इजाज़त अब नहीं है हमारी रेत की सब ये फ़सीलें ये काग़ज़ के महल जो बन रहे हैं हिफ़ाज़त उन की करना है ज़रूरी और आँधी है पुरानी इन की दुश्मन ये सभी जनते हैं किसी का हुक्म है दरिया की लहरें ज़रा ये सर-कशी कम कर लें अपनी हद में ठहरें उभरना फिर बिखरना और बिखर कर फिर उभरना ग़लत है ये उन का हंगामा करना ये सब है सिर्फ़ वहशत की अलामत बग़ावत की अलामत बग़ावत तो नहीं बर्दाश्त होगी ये वहशत तो नहीं बर्दाश्त होगी अगर लहरों को है दरिया में रहना तो उन को होगा अब चुप-चाप बहना किसी का हुक्म है इस गुलिस्ताँ में बस इक रंग के ही फूल होंगे कुछ अफ़सर होंगे जो ये तय करेंगे गुलिस्ताँ किस तरह बनना है कल का यक़ीनन फूल तो यक-रंगीं होंगे मगर ये रंग होगा कितना गहरा कितना हल्का ये अफ़सर तय करेंगे किसी को ये कोई कैसे बताए गुलिस्ताँ में कहीं भी फूल यक-रंगीं नहीं होते कभी हो ही नहीं सकते कि हर इक रंग में छुप कर बहुत से रंग रहते हैं जिन्होंने बाग़-ए-यक-रंगीं बनाना चाहे थे उन को ज़रा देखो कि जब इक रंग में सौ रंग ज़ाहिर हो गए हैं तो कितने परेशाँ हैं कितने तंग रहते हैं किसी को ये कोई कैसे बताए हवाएँ और लहरें कब किसी का हुक्म सुनती हैं हवाएँ हाकिमों की मुट्ठियों में हथकड़ी में क़ैद-ख़ानों में नहीं रुकतीं ये लहरें रोकी जाती हैं तो दरिया कितना भी हो पुर-सुकूँ बेताब होता है और इस बे-ताबी का अगला क़दम सैलाब होता है — Javed Akhtar
अजीब क़िस्सा है जब ये दुनिया समझ रही थी तुम अपनी दुनिया में जी रही हो मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ तो हम ने सारी निगाहों से दूर एक दुनिया बसाई थी जो कि मेरी भी थी तुम्हारी भी थी जहाँ फ़ज़ाओं में दोनों के ख़्वाब जागते थे जहाँ हवाओं में दोनों की सरगोशियाँ घुली थीं जहाँ के फूलों में दोनों की आरज़ू के सब रंग खिल रहे थे जहाँ पे दोनों की जुरअतों के हज़ार चश्में उबल रहे थे न वसवसे थे न रंज-ओ-ग़म थे सुकून का गहरा इक समुंदर था और हम थे अजीब क़िस्सा है सारी दुनिया ने जब ये जाना कि हम ने सारी निगाहों से दूर एक दुनिया बसाई है तो हर एक अबरू ने जैसे हम पर कमान तानी तमाम पेशानियों पे उभरीं ग़म और ग़ुस्से की गहरी शिकनें किसी के लहजे से तल्ख़ी छलकी किसी की बातों में तुरशी आई किसी ने चाहा कि कोई दीवार ही उठा दे किसी ने चाहा हमारी दुनिया ही वो मिटा दे मगर ज़माने को हारना था ज़माना हारा ये सारी दुनिया को मानना ही पड़ा हमारे ख़याल की एक सी ज़मीं है हमारे ख़्वाबों का एक जैसा ही आसमाँ है मगर पुरानी ये दास्ताँ है कि हम पे दुनिया अब एक अर्से से मेहरबाँ है अजीब क़िस्सा है जब कि दुनिया ने कब का तस्लीम कर लिया है हम एक दुनिया के रहने वाले हैं सच तो ये है तुम अपनी दुनिया में जी रही हो मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ! — Javed Akhtar
ख़ला के गहरे समुंदरों में अगर कहीं कोई है जज़ीरा जहाँ कोई साँस ले रहा है जहाँ कोई दिल धड़क रहा है जहाँ ज़ेहानत ने इल्म का जाम पी लिया है जहाँ के बासी ख़ला के गहरे समुंदरों में उतारने को हैं अपने बेड़े तलाश करने कोई जज़ीरा जहाँ कोई साँस ले रहा है जहाँ कोई दिल धड़क रहा है मिरी दुआ है कि उस जज़ीरे में रहने वालों के जिस्म का रंग इस जज़ीरे के रहने वालों के जिस्म के जितने रंग हैं इन से मुख़्तलिफ़ हो बदन की हैअत भी मुख़्तलिफ़ और शक्ल-ओ-सूरत भी मुख़्तलिफ़ हो मिरी दुआ है अगर है उन का भी कोई मज़हब तो इस जज़ीरे के मज़हबों से वो मुख़्तलिफ़ हो मिरी दुआ है कि इस जज़ीरे की सब ज़बानों से मुख़्तलिफ़ हो ज़बान उन की मिरी दुआ है ख़ला के गहरे समुंदरों से गुज़र के इक दिन इस अजनबी नस्ल के जहाज़ी ख़लाई बेड़े में इस जज़ीरे तक आएँ हम उन के मेज़बाँ हों हम उन को हैरत से देखते हों वो पास आ कर हमें इशारों से ये बताएँ कि उन से हम इतने मुख़्तलिफ़ हैं कि उन को लगता है इस जज़ीरे के रहने वाले सब एक से हैं मिरी दुआ है कि इस जज़ीरे के रहने वाले उस अजनबी नस्ल के कहे का यक़ीन कर लें — Javed Akhtar
गलियाँ और गलियों में गलियाँ छोटे घर नीचे दरवाज़े टाट के पर्दे मैली बद-रंगी दीवारें दीवारों से सर टकराती कोई गाली गलियों के सीने पर बहती गंदी नाली गलियों के माथे पर बहता आवाज़ों का गंदा नाला आवाज़ों की भीड़ बहुत है इंसानों की भीड़ बहुत है कड़वे और कसीले चेहरे बद-हाली के ज़हरस हैं ज़हरीले चेहरे बीमारी से पीले चेहरे मरते चेहरे हारे चेहरे बे-बस और बेचारे चेहरे सारे चेहरे एक पहाड़ी कचरे की और उस पर फिरते आवारा कुत्तों से बच्चे अपना बचपन ढूँड रहे हैं दिन ढलता है इस बस्ती में रहने वाले औरों की जन्नत को अपनी मेहनत दे कर अपने जहन्नम की जानिब अब थके हुए झुँझलाए हुए से लौट रहे हैं एक गली में ज़ंग लगे पीपे रक्खे हैं कच्ची दारू महक रही है आज सवेरे से बस्ती में क़त्ल-ओ-ख़ूँ का चाक़ू-ज़नी का कोई क़िस्सा नहीं हुआ है ख़ैर अभी तो शाम है पूरी रात पड़ी है यूँँ लगता है सारी बस्ती जैसे इक दुखता फोड़ा है यूँँ लगता है सारी बस्ती जैसे है इक जलता कढ़ाव यूँँ लगता है जैसे ख़ुदा नुक्कड़ पर बैठा टूटे-फूटे इंसाँ औने-पौने दामों बेच रहा है! — Javed Akhtar
कुछ तुम ने कहा कुछ मैं ने कहा और बढ़ते बढ़ते बात बढ़ी दिल ऊब गया दिल डूब गया और गहरी काली रात बढ़ी तुम अपने घर मैं अपने घर सारे दरवाज़े बंद किए बैठे हैं कड़वे घूँट पिए ओढ़े हैं ग़ुस्से की चादर कुछ तुम सोचो कुछ मैं सोचूँ क्यूँँ ऊँची हैं ये दीवारें कब तक हम इन पर सर मारें कब तक ये अँधेरे रहने हैं कीना के ये घेरे रहने हैं चलो अपने दरवाज़े खोलें और घर के बाहर आएँ हम दिल ठहरे जहाँ हैं बरसों से वो इक नुक्कड़ है नफ़रत का कब तक इस नुक्कड़ पर ठहरें अब इस के आगे जाएँ हम बस थोड़ी दूर इक दरिया है जहाँ एक उजाला बहता है वाँ लहरों लहरों हैं किरनें और किरनों किरनों हैं लहरें इन किरनों में इन लहरों में हम दिल को ख़ूब नहाने दें सीनों में जो इक पत्थर है उस पत्थर को घुल जाने दें दिल के इक कोने में भी छुपी गर थोड़ी सी भी नफ़रत है इस नफ़रत को धुल जाने दें दोनों की तरफ़ से जिस दिन भी इज़हार नदामत का होगा तब जश्न मोहब्बत का होगा — Javed Akhtar
मैं अक्सर सोचता हूँ ज़ेहन की तारीक गलियों में दहकता और पिघलता धीरे धीरे आगे बढ़ता ग़म का ये लावा अगर चाहूँ तो रुक सकता है मेरे दिल की कच्ची खाल पर रक्खा ये अँगारा अगर चाहूँ तो बुझ सकता है लेकिन फिर ख़याल आता है मेरे सारे रिश्तों में पड़ी सारी दराड़ों से गुज़र के आने वाली बर्फ़ से ठंडी हवा और मेरी हर पहचान पर सर्दी का ये मौसम कहीं ऐसा न हो इस जिस्म को इस रूह को ही मुंजमिद कर दे मैं अक्सर सोचता हूँ ज़ेहन की तारीक गलियों में दहकता और पिघलता धीरे धीरे आगे बढ़ता ग़म का ये लावा अज़िय्यत है मगर फिर भी ग़नीमत है इसी से रूह में गर्मी बदन में ये हरारत है ये ग़म मेरी ज़रूरत है मैं अपने ग़म से ज़िंदा हूँ — Javed Akhtar
ये आए दिन के हंगा में ये जब देखो सफ़र करना यहाँ जाना वहाँ जाना इसे मिलना उसे मिलना हमारे सारे लम्हे ऐसे लगते हैं कि जैसे ट्रेन के चलने से पहले रेलवे-स्टेशन पर जल्दी जल्दी अपने डब्बे ढूँडते कोई मुसाफ़िर हों जिन्हें कब साँस भी लेने की मोहलत है कभी लगता है तुम को मुझ से मुझ को तुम से मिलने का ख़याल आए कहाँ इतनी भी फ़ुर्सत है मगर जब संग-दिल दुनिया मेरा दिल तोड़ती है तो कोई उम्मीद चलते चलते जब मुँह मोड़ती है तो कभी कोई ख़ुशी का फूल जब इस दिल में खिलता है कभी जब मुझ को अपने ज़ेहन से कोई ख़याल इन'आम मिलता है कभी जब इक तमन्ना पूरी होने से ये दिल ख़ाली सा होता है कभी जब दर्द आ के पलकों पे मोती पिरोता है तो ये एहसास होता है ख़ुशी हो ग़म हो हैरत हो कोई जज़्बा हो इस में जब कहीं इक मोड़ आए तो वहाँ पल भर को सारी दुनिया पीछे छूट जाती है वहाँ पल भर को इस कठ-पुतली जैसी ज़िंदगी की डोरी टूट जाती है मुझे उस मोड़ पर बस इक तुम्हारी ही ज़रूरत है मगर ये ज़िंदगी की ख़ूब-सूरत इक हक़ीक़त है कि मेरी राह में जब ऐसा कोई मोड़ आया है तो हर उस मोड़ पर मैं ने तुम्हें हम-राह पाया है — Javed Akhtar
आँख खुल गई मेरी हो गया मैं फिर ज़िंदा पेट के अँधेरों से ज़ेहन के धुँदलकों तक एक साँप के जैसा रेंगता ख़याल आया आज तीसरा दिन है...... आज तीसरा दिन है इक अजीब ख़ामोशी मुंजमिद है कमरे में एक फ़र्श और इक छत और चार दीवारें मुझ से बे-तअल्लुक़ सब सब मिरे तमाशाई सामने की खिड़की से तेज़ धूप की किरनें आ रही हैं बिस्तर पर चुभ रही हैं चेहरे में इस क़दर नुकीली हैं जैसे रिश्ते-दारों के तंज़ मेरी ग़ुर्बत पर आँख खुल गई मेरी आज खोखला हूँ मैं सिर्फ़ ख़ोल बाक़ी है आज मेरे बिस्तर में लेटा है मिरा ढाँचा अपनी मुर्दा आँखों से देखता है कमरे को आज तीसरा दिन है आज तीसरा दिन है दोपहर की गर्मी में बे-इरादा क़दमों से इक सड़क पे चलता हूँ तंग सी सड़क पर हैं दोनों सम्त दूकानें ख़ाली ख़ाली आँखों से हर दुकान का तख़्ता सिर्फ़ देख सकता हूँ अब पढ़ा नहीं जाता लोग आते जाते हैं पास से गुज़रते हैं फिर भी कितने धुँदले हैं सब हैं जैसे बे-चेहरा शोर इन दुकानों का राह चलती इक गाली रेडियो की आवाज़ें दूर की सदाएँ हैं आ रही मीलों से जो भी सुन रहा हूँ मैं जो भी देखता हूँ मैं ख़्वाब जैसा लगता है है भी और नहीं भी है दोपहर की गर्मी में बे-इरादा क़दमों से इक सड़क पे चलता हूँ सामने के नुक्कड़ पर नल दिखाई देता है सख़्त क्यूँँ है ये पानी क्यूँँ गले में फँसता है मेरे पेट में जैसे घूँसा एक लगता है आ रहा है चक्कर सा जिस्म पर पसीना है अब सकत नहीं बाक़ी आज तीसरा दिन है आज तीसरा दिन है हर तरफ़ अँधेरा है घाट पर अकेला हूँ सीढ़ियाँ हैं पत्थर की सीढ़ियों पे लेटा हूँ अब मैं उठ नहीं सकता आसमाँ को तकता हूँ आसमाँ को थाली में चाँद एक रोटी है झुक रही हैं अब पलकें डूबता है ये मंज़र है ज़मीन गर्दिश में मेरे घर में चूल्हा था रोज़ खाना पकता था रोटियाँ सुनहरी हैं गर्म गर्म ये खाना खुल नहीं रही आँखें क्या मैं मरने वाला हूँ माँ अजीब थी मेरी रोज़ अपने हाथों से मुझ को वो खिलाती थी कौन सर्द हाथों से छू रहा है चेहरे को इक निवाला हाथी का इक निवाला घोड़े का इक निवाला भालू का मौत है कि बे-होशी जो भी ग़नीमत है मौत है कि बे-होशी जो भी है ग़नीमत है आज तीसरा दिन था........ आज तीसरा दिन था — Javed Akhtar