khoon se seenchi hai main ne jo zameen mar mar ke | ख़ून से सींची है मैं ने जो ज़मीं मर मर के

  - Javed Akhtar

ख़ून से सींची है मैं ने जो ज़मीं मर मर के
वो ज़मीं एक सितम-गर ने कहा उस की है

  - Javed Akhtar

Murder Shayari

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    रोज़ रोने के बहाने ढूँढ़ते है
    बेबसी से अपने रिश्ते ख़ून के है

    देख लेंगे फिर ग़लत क्या है सही क्या
    आ अभी इक दूसरे को चूमते है
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    Aman Mishra 'Anant'
    आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
    आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला
    Dushyant Kumar
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    वो अपने खून से लिखने लगी है नाम मेरा
    अब इस मज़ाक को संजीदगी से लेना है
    Shakeel Jamali
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    पिछ्ला बरस तो ख़ून रुला कर गुज़र गया
    क्या गुल खिलाएगा ये नया साल दोस्तो
    Farooq Engineer
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    मैं ख़ुद को एक गड्ढे में क्यूँ दबा रहा हूँ
    इक फूल के लिए ख़ुद मिट्टी बना रहा हूँ

    मालूम है मुझे वो बच्ची नहीं है फिर भी
    मैं जान बूझ कर के सर पर चढ़ा रहा हूँ

    जिस फूल में मिरी कुल दुनिया रची-बसी है
    उस के लिए मैं दिल में सूरज उगा रहा हूँ

    कोई नहीं मिला जब इस भोर के समय में
    सो मैं भी क्रांति को कम्बल में सुला रहा हूँ

    उस के मकान में जिस से रौशनी हुई है
    उस लैम्प में मैं अपना ही खून पा रहा हूँ
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    Ajit Yadav
    बच्चों के हाथों में रख दी अय्यारी टॉफी के बदले
    देखो मेरा ही ख़ूँ अब मुझको छलता है धीरे-धीरे
    Tarun Pandey
    हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
    वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
    Akbar Allahabadi
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    ख़ुदा रोया बहुत उस दिन ख़ुदा के नेक बन्दों ने
    ख़ुदा के नाम पर मासूम का जब ख़ून कर डाला
    Umesh Maurya
    वफ़ा का ज़ोर अगर बाज़ुओं में आ जाये
    चराग़ उड़ता हुआ जुगनुओं में आ जाये

    खिराजे इश्क़, कहीं जा के तब अदा होगा
    हमारा खून अगर आँसुओं में आ जाये
    Read Full
    Hashim Raza Jalalpuri
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    अपने ख़ून से इतनी तो उम्मीदें हैं
    अपने बच्चे भीड़ से आगे निकलेंगे
    Shakeel Jamali
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As you were reading Shayari by Javed Akhtar

    नेकी इक दिन काम आती है हम को क्या समझाते हो
    हम ने बे-बस मरते देखे कैसे प्यारे प्यारे लोग
    Javed Akhtar
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    यही हालात इब्तिदा से रहे
    लोग हम से ख़फ़ा ख़फ़ा से रहे

    इन चराग़ों में तेल ही कम था
    क्यूँ गिला हम को फिर हवा से रहे

    बहस शतरंज शे'र मौसीक़ी
    तुम नहीं थे तो ये दिलासे रहे

    ज़िंदगी की शराब माँगते हो
    हम को देखो कि पी के प्यासे रहे

    उस के बंदों को देख कर कहिए
    हम को उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे
    Read Full
    Javed Akhtar
    इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं
    होंटों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं
    Javed Akhtar
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    ब-ज़ाहिर क्या है जो हासिल नहीं है
    मगर ये तो मिरी मंज़िल नहीं है

    ये तूदा रेत का है बीच दरिया
    ये बह जाएगा ये साहिल नहीं है

    बहुत आसान है पहचान उस की
    अगर दुखता नहीं तो दिल नहीं है

    मुसाफ़िर वो अजब है कारवाँ में
    कि जो हमराह है शामिल नहीं है

    बस इक मक़्तूल ही मक़्तूल कब है
    बस इक क़ातिल ही तो क़ातिल नहीं है

    कभी तो रात को तुम रात कह दो
    ये काम इतना भी अब मुश्किल नहीं है
    Read Full
    Javed Akhtar
    ये ज़िंदगी भी अजब कारोबार है कि मुझे
    ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का
    Javed Akhtar
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