ye zindagi bhi ajab kaarobaar hai ki mujhe | ये ज़िंदगी भी अजब कारोबार है कि मुझे

  - Javed Akhtar

ये ज़िंदगी भी अजब कारोबार है कि मुझे
ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का

  - Javed Akhtar

Revenge Shayari

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    कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो
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    Avtar Singh Jasser

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    जब आईना कोई देखो इक अजनबी देखो
    कहाँ पे लाई है तुम को ये ज़िंदगी देखो

    मोहब्बतों में कहाँ अपने वास्ते फ़ुर्सत
    जिसे भी चाहे वो चाहे मिरी ख़ुशी देखो

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    उजाला तो नहीं कह सकते इस को हम लेकिन
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    Javed Akhtar
    ज़िंदगी की आँधी में ज़ेहन का शजर तन्हा
    तुम से कुछ सहारा था आज हूँ मगर तन्हा

    ज़ख़्म-ख़ुर्दा लम्हों को मस्लहत सँभाले है
    अन-गिनत मरीज़ों में एक चारागर तन्हा

    बूँद जब थी बादल में ज़िंदगी थी हलचल में
    क़ैद अब सदफ़ में है बन के है गुहर तन्हा

    तुम फ़ुज़ूल बातों का दिल पे बोझ मत लेना
    हम तो ख़ैर कर लेंगे ज़िंदगी बसर तन्हा

    इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
    ढूँढ़ता फिरा उस को वो नगर नगर तन्हा

    झुटपुटे का आलम है जाने कौन आदम है
    इक लहद पे रोता है मुँह को ढाँप कर तन्हा
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    Javed Akhtar
    ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे
    बहुत से ज़र्द चेहरों पर ग़ुबार-ए-ग़म है कम बे-शक पर उन को मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे
    Javed Akhtar
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    जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
    मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

    ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
    बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता

    मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
    किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

    बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
    ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता

    ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो
    कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता
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    Javed Akhtar
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    ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
    बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता
    Javed Akhtar
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