@dhirajsinghtahammul
Dhiraj Singh 'Tahammul' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Dhiraj Singh 'Tahammul''s shayari and don't forget to save your favorite ones.
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हस्ब-ए-दस्तूर दिल को सता तो सही
तू अदावत ही रख पर निभा तो सही
मुझको देखे पे ज़ुल्फ़ें सँवारे है क्यूँ
इश्क़ के क़ायदों को हटा तो सही
छोड़कर तीर-ए-नज़र जान-ए-जिगर देखो नहीं
देखते हो जिस क़दर तुम उस क़दर देखो नहीं
चराग़ाँ ढूँढते हैं आतिश-ए-दिल को बुझाने को
मुहब्बत की समझ दे कौन इस जाहिल ज़माने को
फ़रार-ए-क़ैद लेकर उड़ गया ख़ुशियाँ घराने की
किया था क़ैद इक पंछी कि घर का दिल लगाने को
ख़ुदाया ज़िंदगी में काश ये वक़्फ़ा नहीं होता
यहाँ पेशानियों का बोझ तक हल्का नहीं होता
गुज़र जाते ये दिन हैं वाक़िआत-ए-रोज़-मर्रा में
मगर ये रात का साया कभी धुँदला नहीं होता
ज़िक्र होता है तिरा जब भी धड़कता दिल बहुत है
भूलना तुझको सितमगर आज भी मुश्किल बहुत है
आह से कराह की है चाह पर हूँ चुप
अब फ़क़त है दर्द से निबाह पर हूँ चुप
कर दिया है क़त्ल मैंने आप को कहीं
और हूँ मैं आप ही गवाह पर हूँ चुप
इश्क़ को ढोता हुआ इक ख़र गया मुझमें
अक़्ल कुछ बाक़ी थी आके चर गया मुझमें
फ़लसफ़ी अंदाज़ ये है आपकी नेमत
शाइरी करता था जो कल मर गया मुझमें
साथ दिया है किसने किसका किसकी सोहबत कौन चलेगा
मेरी ज़िल्लत मेरी ख़िफ़्फ़त लेकर तोहमत कौन चलेगा
सुख़न अब तक तिरी ज़ुल्फ़ों के पेचओख़म में उलझा है
हमें जब इश्क़ होगा तो बयाँ अशआर कर देंगे
इश्क़ के बीमार का वाजिब मुक़द्दर मय-कदा
राह मुश्किल है न हो हर मील पर गर मय-कदा
आदमी होते ‘तहम्मुल’ रोज़ जाते काम पर
गर गली ये छोड़ देते है जहाँ पर मय-कदा
शाम को दीदार अपना आइने में हो गया
फ़ाश सब किरदार अपना आइने में हो गया
बरगुज़ीदा एक सूरत क़ैद आँखों में हुई
और बस घर-बार अपना आइने में हो गया
जिस तरफ़ भी हाथ डाला ग़म निकल आए
हो रफ़ू कैसे बदन की दम निकल आए
खा रहा था अक्स तेरा जो रहा मुझमें
थे नहीं महफूज़ खुद में हम निकल आए
है सहज स्वीकार जो जीवन पे वो अपवाद तुम
ज़िंदगी अवसाद है अवसाद में उन्माद तुम
इशारों ही में हाल-ए-दिल मैं सारा खोल जाता हूँ
बहुत ख़ामोश रहकर भी बहुत कुछ बोल जाता हूँ
वस्ल की शब इंतज़ारी में मरे कोई यहाँ
आरज़ू–ए–इश्क़ में क्या–क्या करे कोई यहाँ
बात कोई हो लबों पे बात उनकी आ गई
और क्या हो आँख को ख़ूँ–ख़ूँ भरे कोई यहाँ
बन कर कसक चुभती रही दिल में मिरे इक आह थी
ऐ हम–नफ़स मेरे मुझे तुझसे वफ़ा की चाह थी
अभी हमको मुनासिब आप होते से नहीं लगते
ब–चश्म–ए–तर मुख़ातिब हैं प रोते से नहीं लगते
वही दर्या बहुत गहरा वही तैराक हम अच्छे
हुआ है दफ़्न मोती अब कि गोते से नहीं लगते
ये आई रात आँखों को चलो खूँ–खूँ किया जाए
बदन ये सो भी जाए आँख सोते से नहीं लगते
हुस्न बख़्शा जो ख़ुदा ने आप बख़्शें दीद अपनी
आरज़ू–ए–चश्म पूरी हो मुकम्मल ईद अपनी
ख़ून से जोड़ा हुआ हर ईंट ढेला हो गया
दो तरफ़ चूल्हे जले औ' घर अकेला हो गया