
चराग़ाँ ढूँढ़ते हैं आतिश-ए-दिल को बुझाने को
मुहब्बत की समझ दे कौन इस जाहिल ज़माने को
फ़रार-ए-क़ैद ले कर उड़ गया ख़ुशियाँ घराने की
किया था क़ैद इक पंछी कि घर का दिल लगाने को
— Dhiraj Singh 'Tahammul'
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