फ़क़त हम ही नहीं रुसवा हुए हैं जान दिल्ली में
कई शाहों के टूटे हैं यहाँ अरमान दिल्ली में
लिए हाथों में फिरते हैं सभी दिल दर्द पाने को
नहीं मिलता मगर इस दर्द का दरमान दिल्ली में
मुसलसल ही रही सब रंजिशें अहल-ए-वतन की याँ
वहाँ पर बस बदलते रह गए सुलतान दिल्ली में
सियासत से पड़ेगी आशिक़ी महंँगी बहुत साहिब
ज़बर क़हबा ये इसके हैं कई क़ुर्बान दिल्ली में
उड़ाई है महक मय की लगा मज्मा पियासों का
बिके है कौड़ियों के भाव में ईमान दिल्ली में
ज़माने के हुए मर्दूद फिरते हैं सियाही में
‘तहम्मुल’ भी बने आए थे ‘तुर्रम ख़ान’ दिल्ली में
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