
ख़ुदाया ज़िंदगी में काश ये वक़्फ़ा नहीं होता
यहाँ पेशानियों का बोझ तक हल्का नहीं होता
गुज़र जाते ये दिन हैं वाक़िआत-ए-रोज़-मर्रा में
मगर ये रात का साया कभी धुँदला नहीं होता
— Dhiraj Singh 'Tahammul'
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