है सहज स्वीकार जो जीवन पे वो अपवाद तुम
    ज़िंदगी अवसाद है अवसाद में उन्माद तुम
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    घूमता है दिल में मेरे एक नम ख़याल
    किस तरह से खोजते हैं लोग हम ख़याल
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    इशारों ही में हाल-ए-दिल मैं सारा खोल जाता हूँ
    बहुत ख़ामोश रहकर भी बहुत कुछ बोल जाता हूँ
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    वस्ल की शब इंतज़ारी में मरे कोई यहाँ
    आरज़ू–ए–इश्क़ में क्या–क्या करे कोई यहाँ

    बात कोई हो लबों पे बात उनकी आ गई
    और क्या हो आँख को ख़ूँ–ख़ूँ भरे कोई यहाँ
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    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    बन कर कसक चुभती रही दिल में मिरे इक आह थी
    ऐ हम–नफ़स मेरे मुझे तुझसे वफ़ा की चाह थी
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    अभी हमको मुनासिब आप होते से नहीं लगते
    ब–चश्म–ए–तर मुख़ातिब हैं प रोते से नहीं लगते

    वही दर्या बहुत गहरा वही तैराक हम अच्छे
    हुआ है दफ़्न मोती अब कि गोते से नहीं लगते

    ये आई रात आँखों को चलो खूँ–खूँ किया जाए
    बदन ये सो भी जाए आँख सोते से नहीं लगते
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    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    हुस्न बख़्शा जो ख़ुदा ने आप बख़्शें दीद अपनी
    आरज़ू–ए–चश्म पूरी हो मुकम्मल ईद अपनी
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    ख़ून से जोड़ा हुआ हर ईंट ढेला हो गया
    दो तरफ़ चूल्हे जले औ' घर अकेला हो गया
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    ज़ख़्म लगे हैं कितने दिल पर याद करूँ या तुमको देखूँ
    शाद नहीं हूँ मैं तुमको नाशाद करूँ या तुमको देखूँ

    उम्र गए पे तेरी सूरत और मिरी आँखें टकराईं
    उम्र गए में सोची वो फ़रियाद करूँ या तुमको देखूँ
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    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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    फ़क़त हम ही नहीं रुसवा हुए हैं जान दिल्ली में
    कई शाहों के टूटे हैं यहाँ अरमान दिल्ली में
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
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