Behzad Lakhnavi

Behzad Lakhnavi

@behzad-lakhnavi

📍 Lucknow· India

Behzad Lakhnavi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Behzad Lakhnavi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

26

Content

30

Likes

271

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे — Behzad Lakhnavi
ऐ दिल की ख़लिश चल यूँँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए — Behzad Lakhnavi
मुझे तो होश न था उन की बज़्म में लेकिन ख़मोशियों ने मेरी उन से कुछ कलाम किया — Behzad Lakhnavi
हम भी ख़ुद को तबाह कर लेते तुम इधर भी निगाह कर लेते — Behzad Lakhnavi
आता है जो तूफ़ाँ आने दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है मुमकिन है कि उठती लहरों में बहता हुआ साहिल आ जाए — Behzad Lakhnavi
इश्क़ का ए'जाज़ सज्दों में निहाँ रखता हूँ मैं नक़्श-ए-पा होती है पेशानी जहाँ रखता हूँ मैं — Behzad Lakhnavi
मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ' कहाँ है जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे — Behzad Lakhnavi
ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं जलता हुआ दिया हूँ मगर रौशनी नहीं — Behzad Lakhnavi
ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए — Behzad Lakhnavi
वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहे हैं मैं क्या कर रहा हूँ वो क्या कर रहे हैं — Behzad Lakhnavi

Ghazal

मोहब्बत मुस्तक़िल कैफ़-आफ़रीं मालूम होती है ख़लिश दिल में जहाँ पर थी वहीं मालूम होती है तिरे जल्वों से टकरा कर नहीं मालूम होती है नज़र भी एक मौज-ए-तह-नशीं मालूम होती है नुक़ूश-ए-पा के सदक़े बंदगी-इश्क़ के क़ुर्बां मुझे हर सम्त अपनी ही जबीं मालूम होती है मिरी रग रग में यूँँ तो दौड़ती है इश्क़ की बिजली कहीं ज़ाहिर नहीं होती कहीं मालूम होती है ये ए'जाज़-ए-नज़र कब है ये कब है हुस्न की काविश हसीं जो चीज़ होती है हसीं मालूम होती है उमीदें तोड़ दे मेरे दिल-ए-मुज़्तर ख़ुदा-हाफ़िज़ ज़बान-ए-हुस्न पर अब तक नहीं मालूम होती है उसे क्यूँँ मय-कदा कहता है बतला दे मिरे साक़ी यहाँ की सर-ज़मीं ख़ुल्द-ए-बरीं मालूम होती है अरे ऐ चारा-गर हाँ हाँ ख़लिश तू जिस को कहता है ये शय दिल में नहीं दिल के क़रीं मालूम होती है किसी के पा-ए-नाज़ुक पर झुकी है और नहीं उठती मुझे 'बहज़ाद' ये अपनी जबीं मालूम होती है — Behzad Lakhnavi
है ख़िरद-मंदी यही बा-होश दीवाना रहे है वही अपना कि जो अपने से बेगाना रहे कुफ़्र से ये इल्तिजाएँ कर रहा हूँ बार बार जाऊँ तो का'बा मगर रुख़ सू-ए-मय-ख़ाना रहे शम-ए-सोज़ाँ कुछ ख़बर भी है तुझे ओ मस्त-ए-ग़म हुस्न-ए-महफ़िल है जभी जब तक कि परवाना रहे ज़ख़्म-ए-दिल ऐ ज़ख़्म-ए-दिल नासूर क्यूँँ बनता नहीं लुत्फ़ तो जब है कि अफ़्साने में अफ़्साना रहे हम को वाइज़ का भी दिल रखना है साक़ी का भी दिल हम तो तौबा कर के भी पाबंद-ए-मय-ख़ाना रहे आख़िरश कब तक रहेंगी हुस्न की नादानियाँ हुस्न से पूछो कि कब तक इश्क़ दीवाना रहे फ़ैज़-ए-राह-ए-इश्क़ है या फ़ैज़-ए-जज़्ब-ए-इश्क़ है हम तो मंज़िल पा के भी मंज़िल से बेगाना रहे मय-कदे में हम दुआएँ कर रहे हैं बार बार इस तरफ़ भी चश्म-ए-मस्त-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना रहे आज तो साक़ी से ये 'बहज़ाद' ने बाँधा है अहद लब पे तौबा हो मगर हाथों में पैमाना रहे — Behzad Lakhnavi
दिल मेरा तेरा ताब-ए-फ़रमाँ है क्या करूँँ अब तेरा कुफ़्र ही मिरा ईमाँ है क्या करूँँ बा-होश हूँ मगर मिरा दामन है चाक चाक आलम ये देख देख के हैराँ है क्या करूँँ हर तरह का सुकून है हर तरह का है कैफ़ फिर भी ये मेरा क़ल्ब परेशाँ है क्या करूँँ कहता नहीं हूँ और ज़माना है बा-ख़बर चेहरे से दिल का हाल नुमायाँ है क्या करूँँ दामन करूँँ न चाक ये मुमकिन तो है मगर मुज़्तर हर एक तार-ए-गरेबाँ है क्या करूँँ सादा सा इक वरक़ हूँ किताब-ए-हयात का हसरत से अब न अब कोई अरमाँ है क्या करूँँ हर सम्त पा रहा हूँ वही रंग-ए-दिल-फ़रेब हाथों में कुफ़्र के मिरा ईमाँ है क्या करूँँ दाग़ों का क़ल्ब-ए-ज़ार से मुमकिन तो है इलाज उन के ही दम से दिल में चराग़ाँ है क्या करूँँ इक बे-वफ़ा के वास्ते से सब कुछ लुटा दिया 'बहज़ाद' अब न दीन न ईमाँ है क्या करूँँ — Behzad Lakhnavi
उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं हाँ बता दे ऐ जबीन-ए-शौक़ क्या समझा था मैं अल्लाह अल्लाह क्या इनायत कर गई मिज़राब-ए-इश्क़ वर्ना साज़-ए-ज़िंदगी को बे-सदा समझा था मैं उन से शिकवा क्यूँँ करूँँ उन से शिकायत क्या करूँँ ख़ुद बड़ी मुश्किल से अपना मुद्दआ' समझा था मैं मेरी हालत देखिए मेरा तड़पना देखिए आप को इस से ग़रज़ क्या है कि क्या समझा था मैं खुल गया ये राज़ उन आँखों के अश्क-ए-नाज़ से कैफ़ियात-ए-हुस्न को ग़म से जुदा समझा था मैं ऐ जबीन-ए-शौक़ हाँ तुझ को बड़ी ज़हमत हुई आज हर ज़र्रे को उन का नक़्श-ए-पा समझा था मैं इक नज़र पर मुनहसिर थी ज़ीस्त की कुल काएनात हर नज़र को जान जान-ए-मुद्दआ समझा था मैं आ रहा है क्यूँँ किसी का नाम होंटों तक मिरे ऐ दिल-ए-मुज़्तर तुझे सब्र-आज़मा समझा था मैं आप तो हर हर क़दम पर हो रहे हैं जल्वा-गर आप को हद्द-ए-नज़र से मावरा समझा था मैं ये फ़ुग़ाँ ये शोर ये नाले ये शेवन थे फ़ुज़ूल क्या बताती थी मोहब्बत और क्या समझा था मैं उस निगाह-ए-नाज़ ने 'बहज़ाद' मुझ को खो दिया जिस निगाह-ए-नाज़ को अपनी दवा समझा था मैं — Behzad Lakhnavi
तुझ पर मिरी मोहब्बत क़ुर्बान हो न जाए ये कुफ़्र बढ़ते बढ़ते ईमान हो न जाए अल्लाह री बे-नक़ाबी उस जान-ए-मुद्दआ की मेरी निगाह-ए-हसरत हैरान हो न जाए मेरी तरफ़ न देखो अपनी नज़र को रोको दुनिया-ए-आशिक़ी में हैजान हो न जाए पलकों पे रुक गया है आ कर जो एक आँसू ये क़तरा बढ़ते बढ़ते तूफ़ान हो न जाए हद्द-ए-सितम तो है भी हद्द-ए-वफ़ा नहीं है ज़ालिम तिरा सितम भी एहसान हो न जाए होती नहीं है वक़अत होती नहीं है इज़्ज़त जब तक कि कोई इंसाँ इंसान हो न जाए उस वक़्त तक मुकम्मल होता नहीं है कोई जब तक कि ख़ुद को अपनी पहचान हो न जाए 'बहज़ाद' इस लिए मैं कहता नहीं हूँ दिल की डरता हूँ सुन के दुनिया हैरान हो न जाए — Behzad Lakhnavi
इक बे-वफ़ा को प्यार किया हाए क्या किया ख़ुद दिल को बे-क़रार किया हाए क्या किया मालूम था कि अहद-ए-वफ़ा उन का झूट है इस पर भी ए'तिबार किया हाए क्या किया वो दिल कि जिस पे क़ीमत-ए-कौनैन थी निसार नज़्र-ए-निगाह-ए-यार किया हाए क्या किया ख़ुद हम ने फ़ाश फ़ाश किया राज़-ए-आशिक़ी दामन को तार तार किया हाए क्या किया आहें भी बार बार भरीं उन के हिज्र में नाला भी बार बार किया हाए क्या किया मिटने का ग़म नहीं है बस इतना मलाल ही क्यूँँ तेरा इंतिज़ार किया हाए क्या किया हम ने तो ग़म को सीने से अपने लगा लिया ग़म ने हमें शिकार किया हाए क्या किया सय्याद की रज़ा ये हम आँसू न पी सके उज़्र-ए-ग़म-बहार किया हाए क्या किया क़िस्मत ने आह हम को ये दिन भी दिखा दिए क़िस्मत पे ए'तिबार किया हाए क्या किया रंगीनी-ए-ख़याल से कुछ भी न बच सका हर शय को पुर-बहार किया हाए क्या किया दिल ने भुला भुला के तिरी बेवफ़ाइयाँ फिर अहद उस्तुवार किया हाए क्या किया उन के सितम भी सह के न उन से किया गिला क्यूँँ जब्र इख़्तियार किया हाए क्या किया काफ़िर की चश्म-ए-नाज़ पे क्या दिल-जिगर का ज़िक्र ईमान तक निसार किया हाए क्या किया काली घटा के उठते ही तौबा न रह सकी तौबा पे ए'तिबार किया हाए क्या किया शाम-ए-फ़िराक़ क़ल्ब के दाग़ों को गिन लिया तारों को भी शुमार किया हाए क्या किया 'बहज़ाद' की न क़दर कोई तुम को हो सकी तुम ने ज़लील-ओ-ख़्वार क्या हाए क्या किया — Behzad Lakhnavi
तिरे इश्क़ में ज़िंदगानी लुटा दी अजब खेल खेला जवानी लुटा दी नहीं दिल में दाग़-ए-तमन्ना भी बाक़ी उन्हीं पर से उन की निशानी लुटा दी कुछ इस तरह ज़ालिम ने देखा कि हम ने न सोचा न समझा जवानी लुटा दी तुम्हारे ही कारन तुम्हारी बदौलत तुम्हारी क़सम ज़िंदगानी लुटा दी अदाओं को देखा निगाहों को देखा हज़ारों तरह से जवानी लुटा दी ग़ज़ब तो ये है हम ने महफ़िल की महफ़िल सुना कर वफ़ा की कहानी लुटा दी जहाँ कोई देखा हसीं जल्वा-आरा वहीं हम ने अपनी जवानी लुटा दी निगाहों से साक़ी ने सहबा-ए-उल्फ़त सितम ये है ता-दौर-ए-सानी लुटा दी जवानी के जज़्बों से अल्लाह समझे जवानी जो देखी जवानी लुटा दी बुझाई है प्यास आज दामन की हम ने शराबता-ए-नज़र कर के पानी लुटा दी तुम्हीं पर से 'बहज़ाद' ने बे-ख़ुदी में क्या दिल तसद्दुक़ जवानी लुटा दी — Behzad Lakhnavi
यूँँ तो जो चाहे यहाँ साहिब-ए-महफ़िल हो जाए बज़्म उस शख़्स की है तू जिसे हासिल हो जाए नाख़ुदा ऐ मिरी कश्ती के चलाने वाले लुत्फ़ तो जब है कि हर मौज ही साहिल हो जाए इस लिए चल के हर इक गाम पे रुक जाता हूँ ता न बे-कैफ़ ग़म-ए-दूरी-ए-मंज़िल हो जाए तुझ को अपनी ही क़सम ये तो बता दे मुझ को क्या ये मुमकिन है कभी तू मुझे हासिल हो जाए हाए उस वक़्त दिल-ए-ज़ार का आलम क्या हो गर मोहब्बत ही मोहब्बत के मुक़ाबिल हो जाए फीका फीका है मिरी बज़्म-ए-मोहब्बत का चराग़ तुम जो आ जाओ तो कुछ रौनक़-ए-महफ़िल हो जाए तेरी नज़रें जो ज़रा मुझ पे करम फ़रमाएँ तेरी नज़रों की क़सम फिर यही दिल दिल हो जाए होश उस के हैं ये जाम उस का है तू है उस का मय-कदे में तिरे जो शख़्स भी ग़ाफ़िल हो जाए फ़ित्नागर शौक़ से 'बहज़ाद' को कर दे पामाल इस से तस्कीन-ए-दिली गर तुझे हासिल हो जाए — Behzad Lakhnavi
ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए ऐ दिल की लगी चल यूँँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल आ जाए हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना इस राह-ए-मोहब्बत में कोई दरपेश जो मुश्किल आ जाए अब क्यूँँ ढूँडूँ वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बाला-ए-सितम मैं चाहता हूँ ऐ जज़्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाए इस जज़्बा-ए-दिल के बारे में इक मशवरा तुम से लेता हूँ उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुझ पे मिरा दिल आ जाए ऐ बर्क़-ए-तजल्ली कौंध ज़रा क्या मुझ को भी मूसा समझा है मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाए कश्ती को ख़ुदा पर छोड़ भी दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाए — Behzad Lakhnavi
होना ही क्या ज़रूर थे ये दो-जहाँ हैं क्यूँँ अल्लाह इक फ़रेब में कौन-ओ-मकाँ हैं क्यूँँ सुनते हैं एक दर्द तो उठता है बार-बार उस की ख़बर नहीं है कि आँसू रवाँ हैं क्यूँँ इन बे-नियाज़ियों में भी शान-ए-नियाज़ है सज्दे नहीं पसंद तो फिर आस्ताँ हैं क्यूँँ जिस गुलिस्ताँ में रोज़ तड़पती हैं बिजलियाँ यारब उसी चमन में ये फिर आशियाँ हैं क्यूँँ इस का हमें मलाल है हम क्यूँँ बदल गए इस का नहीं मलाल कि वो बद-गुमाँ हैं क्यूँँ जब दिल नहीं रहा तो तमन्ना का काम क्या जब कारवाँ नहीं तो पस-ए-कारवाँ हैं क्यूँँ 'बहज़ाद' उन के हिज्र में घबरा रहा है दिल अब क्या कहें किसी से कि बस ख़ानुमाँ हैं क्यूँँ — Behzad Lakhnavi
फ़रियाद है अब लब पर जब अश्क-फ़िशानी थी ये और कहानी है वो और कहानी थी अब दिल में रहा क्या है जुज़ हसरत-ओ-नाकामी वो नीश कहाँ बाक़ी ख़ुद जिस की निशानी थी जब दर्द सा था दिल में अब दर्द ही ख़ुद दिल है हाँ अब जो हक़ीक़त है पहले ये कहानी थी पुर-आब सी रहती थीं पहले ये मिरी आँखें हाँ हाँ इसी दरिया में अश्कों की रवानी थी ऐ चश्म हक़ीक़त में दुनिया को ये समझा दे बाक़ी भी वही निकली जो चीज़ कि फ़ानी थी बुलबुल ने तो अफ़्साना अपना ही सुनाया था गुलशन की कहानी तो फूलों की ज़बानी थी यूँँ अश्क बहाए थे यूँँ कीं न थीं फ़रियादें इक बात छुपानी थी इक बात बतानी थी सादा नज़र आता है अब तो वरक़-ए-दामन अब तक मिरे दामन पर आँखों की निशानी थी 'बहज़ाद' का वो आलम भी ख़ूब ही आलम था 'बहज़ाद' की नज़रों में हर चीज़ जवानी थी — Behzad Lakhnavi
इक बे-वफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया हम ने तो आह कुफ़्र को ईमाँ बना लिया दिल की ख़लिश-पसंदियाँ हैं कि अल्लाह की पनाह तीर-ए-नज़र को जान-ए-रग-ए-जाँ बना लिया मुझ को ख़बर नहीं मिरे दिल को ख़बर नहीं किस की नज़र ने बंदा-ए-एहसाँ बना लिया महसूस कर के हम ने मोहब्बत का हर अलम ख़्वाब-ए-सुबुक को ख़्वाब-ए-परेशाँ बना लिया दस्त-ए-जुनूँ की उक़्दा-कुशाई तो देखिए दामन को बे-नियाज़ गरेबाँ बना लिया तस्कीन-ए-दिल की हम ने भी परवाह छोड़ दी हर मौज-ए-ग़म को हासिल-ए-तूफ़ाँ बना लिया जब उन का नाम आ गया हम मुज़्तरिब हुए आहों को अपनी ज़ीस्त का उनवाँ बना लिया हम ने तो अपने दिल में वो ग़म हो कि हो अलम जो कोई आ गया उसे मेहमाँ बना लिया आईना देखने की ज़रूरत न थी कोई अपने को ख़ुद ही आप ने हैराँ बना लिया इक बे-वफ़ा पे कर के तसद्दुक़ दिल-ओ-जिगर 'बहज़ाद' हम ने ख़ुद को परेशाँ बना लिया — Behzad Lakhnavi
ख़ुदा को ढूँड रहा था कहीं ख़ुदा न मिला ज़हे-नसीब कि बंदे को मुद्दआ' न मिला निगाह-ए-शौक़ में बे-नूरियों का रंग बढ़ा निगाह-ए-शौक़ को जब कोई दूसरा न मिला हम अपनी बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पर निसार रहे ख़ुदी को ढूँढ़ लिया जब हमें ख़ुदा न मिला तुम्हारी बज़्म में लब खोल कर हुआ ख़ामोश वो बद-नसीब जिसे कोई आसरा न मिला हर एक ज़र्रे में मैं ख़ुद तो आ रहा था नज़र अजीब बात तुम्हारा कहीं पता न मिला बस इक सुकून ही हम को न मिल सका ता-उम्र वगरना तेरे तसद्दुक़ में हम को क्या न मिला तिरी निगाह-ए-मोहब्बत-नवाज़ ही की क़सम कि आज तक तो हमें तुझ सा दूसरा न मिला तिरा जमाल फ़ज़ाओं में मुंतशिर था मगर निगाह-ए-शौक़ को फिर भी तिरा पता न मिला हज़ार ठोकरें खाईं हज़ार सू 'बहज़ाद' जहान-ए-हुस्न में कोई भी बा-वफ़ा न मिला — Behzad Lakhnavi
लब पे है फ़रियाद अश्कों की रवानी हो चुकी इक कहानी छिड़ रही है इक कहानी हो चुकी मेहर के पर्दे में पूरी दिल-सितानी हो चुकी बंदा-परवर रहम कीजिए मेहरबानी हो चुकी मेरा दिल ताका गया जौर ओ जफ़ा के वास्ते जब कि पूरे रंग पर उन की जवानी हो चुकी जाइए भी क्यूँँ मुझे झूटी तशफ़्फ़ी दीजिए आप से और मेरे दिल की तर्जुमानी हो चुकी आ गया ऐ सुनने वाले अब मुझे पास-ए-वफ़ा अब बयाँ रूदाद-ए-दिल मेरी ज़बानी हो चुकी आख़िरी आँसू मिरी चश्म-ए-अलम से गिर चुका सुनने वालो ख़त्म अब मेरी कहानी हो चुकी हम भी तंग आ ही गए आख़िर नियाज़ ओ नाज़ से हाँ ख़ुशा क़िस्मत कि उन की मेहरबानी हो चुकी सुनने वाले सूरत-ए-तस्वीर बैठे हैं तमाम हज़रत-ए-'बहज़ाद' बस जादू-बयानी हो चुकी — Behzad Lakhnavi
ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ मगर हाँ दिल में कुछ कुछ ज़ेर-ओ-बम महसूस करता हूँ मोहब्बत की ये नैरंगी भी दुनिया से निराली है अलम कोई नहीं लेकिन अलम महसूस करता हूँ मिरी नज़रों में अब बाक़ी नहीं है ज़ौक़-ए-कुफ़्र-ओ-दीं मैं इक मरकज़ पे अब दैर-ओ-हरम महसूस करता हूँ जो लुत्फ़-ए-ज़िंदगानी मिल रहा था घटता जाता है ख़लिश जो दिल में रहती थी वो कम महसूस करता हूँ तुम्हारे ज़िक्र पर कब मुनहसिर है दिल की बे-ताबी किसी का ज़िक्र हो मैं चश्म-ए-नम महसूस करता हूँ कभी पाता हूँ दिल में एक हश्र-ए-दर्द-ए-बेताबी कभी मैं अपने दिल में दर्द-ओ-ग़म महसूस करता हूँ ज़बाँ पर मेरी शिकवा आ नहीं सकता ज़माने का कि हर आलम को मैं उन का करम महसूस करता हूँ ये दिल में है जो घबराहट ये आँखों में है जो आँसू इस एहसाँ को भी बाला-ए-करम महसूस करता हूँ ख़ुशी की मुझ को अब बहज़ाद कुछ हाजत नहीं बाक़ी कि ग़म को भी मैं अब उन का करम महसूस करता हूँ — Behzad Lakhnavi
तुम्हारे हुस्न की तस्ख़ीर आम होती है कि इक निगाह में दुनिया तमाम होती है जहाँ पे जल्वा-ए-जानाँ है अंजुमन-आरा वहाँ निगाह की मंज़िल तमाम होती है वही ख़लिश वही सोज़िश वही तपिश वही दर्द हमें सहर भी ब-अंदाज़-ए-शाम होती है निगाह-ए-हुस्न मुबारक तुझे दर-अंदाज़ी कभी कभी मिरी महफ़िल भी आम होती है ज़हे नसीब में क़ुर्बान अपनी क़िस्मत के तिरे लिए मिरी दुनिया तमाम होती है नमाज़-ए-इश्क़ का है इंहिसार अश्कों तक ये बे-नियाज़-ए-सुजूद-ओ-क़याम होती है तिरी निगाह के क़ुर्बां तिरी निगाह की टीस ये ना-तमाम ही रह कर तमाम होती है वहाँ पे चल मुझे ले कर मिरे समंद-ए-ख़याल जहाँ निगाह की मस्ती हराम होती है किसी के ज़िक्र से 'बहज़ाद' मुब्तला अब तक जिगर में इक ख़लिश-ए-ना-तमाम होती है — Behzad Lakhnavi
क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ तू जान-ए-तमाशा है मैं महव-ए-तमाशा हूँ तू बाइस-ए-हस्ती है मैं हासिल-ए-हस्ती हूँ तू ख़ालिक़-उल्फ़त है और मैं तिरा बंदा हूँ जब तक न मिला था तू ऐ फ़ित्ना-ए-दो-आलम जब दर्द से ग़ाफ़िल था अब दर्द की दुनिया हूँ कुछ फ़र्क़ नहीं तुझ में और मुझ में कोई लेकिन तू और किसी का है बे-दर्द मैं तेरा हूँ मुद्दत हुई खो बैठा सरमाया-ए-तस्कीं मैं अब तो तिरी फ़ुर्क़त में दिन रात तड़पता हूँ अरमान नहीं कोई गो दिल में मिरे लेकिन अल्लाह री मजबूरी मजबूर-ए-तमन्ना हूँ 'बहज़ाद'-ए-हज़ीं मुझ पर इक कैफ़ सा तारी है अब ये मिरा आलम है हँसता हूँ न रोता हूँ — Behzad Lakhnavi
मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं तेरे बग़ैर ज़ीस्त तो है ज़िंदगी नहीं मैं दर्द-ए-आशिक़ी को समझता हूँ जान-ओ-रूह कम्बख़्त वो भी दिल में कभी है कभी नहीं ला ग़म ही डाल दे मिरे दस्त-ए-सवाल में मैं क्या करूँं ख़ुशी को जो तेरी ख़ुशी नहीं कुछ देर और रहने दे ख़ुद्दारी-ए-जुनूँ दामन तो चाक होना है लेकिन अभी नहीं साक़ी निगाह-ए-नाज़ से लिल्लाह काम ले सौ जाम पी चुका हूँ मगर बे-ख़ुदी नहीं रखनी पड़ेगी तुम को तही-दामनी की लाज मुझ को कमी ज़रूर है तुम को कमी नहीं 'बहज़ाद' साफ़ साफ़ मैं कहता हूँ हाल-ए-दिल शर्मिंदा-ए-कमाल मिरी शा'इरी नहीं — Behzad Lakhnavi