तुम्हारी बे-रुख़ी इक दिन हमारी जान ले लेगी
क़सम तुम को ज़रा सोचो कि दस्तूर-ए-वफ़ा क्या है
न जाने किस लिए दुनिया की नज़रें फिर गईं हम से
तुम्हें देखा तुम्हें चाहा क़ुसूर इस के सिवा क्या है
न है फ़रियाद होंटों पर न आँखों में कोई आँसू
ज़माने से मिला जो ग़म उसे गीतों में गाया है
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ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो
तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे
मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ' कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे
आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की
का'बा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे
'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे
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अल्लाह री बे-नक़ाबी उस जान-ए-मुद्दआ की
मेरी निगाह-ए-हसरत हैरान हो न जाए
मेरी तरफ़ न देखो अपनी नज़र को रोको
दुनिया-ए-आशिक़ी में हैजान हो न जाए
पलकों पे रुक गया है आ कर जो एक आँसू
ये क़तरा बढ़ते बढ़ते तूफ़ान हो न जाए
हद्द-ए-सितम तो है भी हद्द-ए-वफ़ा नहीं है
ज़ालिम तिरा सितम भी एहसान हो न जाए
होती नहीं है वक़अत होती नहीं है इज़्ज़त
जब तक कि कोई इंसाँ इंसान हो न जाए
उस वक़्त तक मुकम्मल होता नहीं है कोई
जब तक कि ख़ुद को अपनी पहचान हो न जाए
'बहज़ाद' इस लिए मैं कहता नहीं हूँ दिल की
डरता हूँ सुन के दुनिया हैरान हो न जाए
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तू बाइस-ए-हस्ती है मैं हासिल-ए-हस्ती हूँ
तू ख़ालिक़-उल्फ़त है और मैं तिरा बंदा हूँ
जब तक न मिला था तू ऐ फ़ित्ना-ए-दो-आलम
जब दर्द से ग़ाफ़िल था अब दर्द की दुनिया हूँ
कुछ फ़र्क़ नहीं तुझ में और मुझ में कोई लेकिन
तू और किसी का है बे-दर्द मैं तेरा हूँ
मुद्दत हुई खो बैठा सरमाया-ए-तस्कीं मैं
अब तो तिरी फ़ुर्क़त में दिन रात तड़पता हूँ
अरमान नहीं कोई गो दिल में मिरे लेकिन
अल्लाह री मजबूरी मजबूर-ए-तमन्ना हूँ
'बहज़ाद'-ए-हज़ीं मुझ पर इक कैफ़ सा तारी है
अब ये मिरा आलम है हँसता हूँ न रोता हूँ
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ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए
ऐ दिल की लगी चल यूँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए
ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल आ जाए
हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना
इस राह-ए-मोहब्बत में कोई दरपेश जो मुश्किल आ जाए
अब क्यूँ ढूँडूँ वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बाला-ए-सितम
मैं चाहता हूँ ऐ जज़्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाए
इस जज़्बा-ए-दिल के बारे में इक मशवरा तुम से लेता हूँ
उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुझ पे मिरा दिल आ जाए
ऐ बर्क़-ए-तजल्ली कौंध ज़रा क्या मुझ को भी मूसा समझा है
मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाए
कश्ती को ख़ुदा पर छोड़ भी दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाए
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ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए
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आता है जो तूफ़ाँ आने दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
मुमकिन है कि उठती लहरों में बहता हुआ साहिल आ जाए
मुमकिन है कि उठती लहरों में बहता हुआ साहिल आ जाए
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मैं दर्द-ए-आशिक़ी को समझता हूँ जान-ओ-रूह
कम्बख़्त वो भी दिल में कभी है कभी नहीं
ला ग़म ही डाल दे मिरे दस्त-ए-सवाल में
मैं क्या करूँं ख़ुशी को जो तेरी ख़ुशी नहीं
कुछ देर और रहने दे ख़ुद्दारी-ए-जुनूँ
दामन तो चाक होना है लेकिन अभी नहीं
साक़ी निगाह-ए-नाज़ से लिल्लाह काम ले
सौ जाम पी चुका हूँ मगर बे-ख़ुदी नहीं
रखनी पड़ेगी तुम को तही-दामनी की लाज
मुझ को कमी ज़रूर है तुम को कमी नहीं
'बहज़ाद' साफ़ साफ़ मैं कहता हूँ हाल-ए-दिल
शर्मिंदा-ए-कमाल मिरी शा'इरी नहीं
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