Aqib khan

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@AkibKhan

Akib khan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akib khan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हो चुका हो खेल तो फिर चल पड़ें घर की तरफ़ हाँ अगर अब फिर से उलझा तो समझ क़िस्सा तमाम — Aqib khan
बड़ी अजीब सी रौनक़ है आज गलियों में सुना है आप यहाँ बन-सँवर के गुज़रे थे — Aqib khan
अभी भी वक़्त है जोड़ो तो ख़ुद को जोड़ सकते हो अभी टुकड़े हुए हैं कोई चकनाचूर थोड़ी हो — Aqib khan
साथ जितने थे हमारे अब वो ओझल हो गए हैं ज़िंदगी की दौड़ में हम इस क़दर पीछे खड़े हैं — Aqib khan
हम को ख़राब वक़्त में अंदाज़ा ये हुआ कुछ आदतें ख़राब भी रखनी ही चाहिए — Aqib khan
मैं ने उन की बात न मानी ठीक कहा था लोगों ने सड़ जाता है ठहरा पानी ठीक कहा था लोगों ने — Aqib khan
एक तस्वीर थी पुरानी सी याद क्या क्या दिला गई मुझ को — Aqib khan
उम्मीद ये थी दुनिया को जीतेंगे एक दिन और ये हुआ कि हार के बैठे हैं अपना घर — Aqib khan
हम ऐसे लोग जो रुकना ग़लत समझते थे फिर एक शख़्स पे ठहरे तो लाश हो बैठे — Aqib khan
मैं जानता हूँ साँप है पर आस्तीं में रह हम सेे नया न कोई भी अब पाला जाएगा — Aqib khan
हड़प्पा के मकानों में हैं रौशनदान दरवाज़े मगर वो लोग ताका-झाँकी को खिड़की नहीं रखते — Aqib khan
टूटे हुए टुकड़ों को ज़रा जोड़ के देखो तब ये नज़र आ जाएगा क्या चीज़ थे तुम भी — Aqib khan
मैं बचकर निकल आया हूँ आइनों से पर अपना ही चेहरा भला कैसे भूलूँ — Aqib khan
तू ना कहता था दिल की सुनो सुन लूँ क्या ख़ुद-कुशी के लिए रोज़ कहता है ये — Aqib khan
छूटने वाले तो मुड़कर ही खड़े रहते हैं छोड़ने वाले पलटकर नहीं देखा करते — Aqib khan
तुम जो रहे हो वो भी बड़ी बात है मगर तुम हो गए हो क्या ज़रा ये भी तो देख लो — Aqib khan
अपने लिए तो इश्क़ भी ग़ैरत की चीज़ थी हम लोग वो थे जिन को पढ़ाया ग़लत गया — Aqib khan

Ghazal

Nazm

“अँधेरा” जाने किस की तलाश में थे हम जाने किस रास्ते को जाते थे हर तरफ़ हर जगह अँधेरा था थोड़े जुगनू से टिमटिमाते थे सोचते थे कि रौशनी होगी ये अँधेरा भला है कब तक का फिर कहीं ये पता चला हम को चाँद जो जगमगाता दिखता है बात सच है मगर है आधी सच चाँद के पीछे बस अँधेरा है वो अँधेरा जो ख़त्म होता नहीं वो अँधेरा जो है सदा के लिए और वहाँ रौशनी की उम्मीदें बस ख़यालों में पूरी होती हैं हम भी ऐसे ही रास्ते पे थे जिस की मंज़िल फ़क़त ख़याली थी जिस का मिलना था यारों नामुमकिन जब तलक जान पाए ये आक़िब पीछे जाने का हौसला न रहा आगे बढ़ना भी अब है बेमानी अब भटकते हैं बस अँधेरे में और बस इंतिज़ार करते हैं उस कहानी के ख़त्म होने का जिस के पन्नों पे कुछ लिखा ही नहीं क्या ये पन्ने सफ़ेद पन्ने नहीं क्या ये पन्ने सियाह पन्ने हैं या ये मुझ को सियाह दिखते हैं — Aqib khan
"वापसी मुश्किल है" अब कहाँ पर पहुँच गए हो दोस्त तुम तो रस्ता भटक गए हो दोस्त कितने चौकन्ने हो के निकले थे फिर भला क्यूँँ बहक गए हो दोस्त कुछ तो सोचो कहाँ पे जाना है जो भी चाहा है कैसे पाना है कुछ तो बोलो कि अब करोगे क्या या फ़क़त वक़्त ही बिताना है जाने कितनों की आस हो तुम तो यूँँ न हो आस उन की मर जाए बे-सबब होगा जीतना तब तो मन अगर उन का तुम सेे भर जाए अब भी मौका है तुम ठहर जाओ इस सेे पहले कि यूँँ ही मर जाओ ठहरो! सोचो कहाँ पे जाना है कुछ न रस्ता दिखे तो घर जाओ घर का रस्ता मैं जानता हूँ मगर क्या कहूँगा गया मैं ऐसे अगर उन की आँखें सवाल पूछेंगी उन की आँखें सवाल पूछेंगी — Aqib khan
नज़्म: कामयाब साज़िश था कच्चा मकाँ सो खटकता था सब को यूँँ लगता था बारिश में गिर जाएगा अब मगर नींव थी उस की मज़बूत इतनी कई बारिशों तक खड़ा ही रहा वो मगर फिर अचानक से ऐसा हुआ नई बारिशों ने की साज़िश नई गिराना है इस को तो हर एक सूरत चलो साथ मिल कर के हमला करें मगर याद रखना, जो हमला है करना हो इक ही जगह पर, हो इक साथ वो भी है मजबूत जितना बिखर जाएगा वो धराशाही होकर किधर जाएगा वो ज़मींदोज़ होगा वो अबकी, है दावा ये दावा किया और लगे काम पर सब उधर उस मकाँ को न मालूम था ये वो अनजान, चुप-चाप, ख़ुश था बहुत ही फिर इक रोज़ बिजली लगी कड़कड़ाने लगा दिन में ही फिर अँधेरा सा छाने था ऐसा ये मंज़र जो देखा न पहले दुआ करते थे सब बचा ले बचा ले न उस ने बचाया, न ये बच सके ख़ुद वही फिर हुआ जो कि होता है सच में पुराना मकाँ इक ज़मींदोज़ था और दरारें पड़ी थीं क़रीबी मकाँ में सुना है क़रीबी मकाँ भी था साज़िश का हिस्सा जो इस का क़रीबी है दुश्मन है इस का — Aqib khan