"तुम नहीं जानते"
मन को बहलाया पागल नहीं मानता
क्या है अपना पराया नहीं जानता
है ये पागल जो आँखों के फंदे पड़ा
और फिर बे-हया डूबता ही गया
डूबा ऐसे कि जैसे मिली ज़िंदगी
ये नहीं जानता है हसीं मौत ही
और फिर ऐसे रस्ते पे ला कर खड़ा
कर दिया इसने मुझ को सो कहता हूँ अब
किस तरह कट रहा है ये बेजाँ सफ़र
जिस को पाया नहीं उस को खोने का डर
तुम नहीं जानते तुम नहीं जानते
ऐ मेरे दोस्ताँ तुम नहीं जानते
— Aqib khan















