Kartik Bhalerao

Kartik Bhalerao

@kartikbhalerao39

Kartik Bhalerao shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kartik Bhalerao's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

3

Content

69

Likes

22

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

वो फूल किसी तरह भी खिलने के नहीं दोस्त बरसात के मौसम में जो मुरझाने लगे हैं — Kartik Bhalerao
हाथी कुछ इसलिए भी तो सर पर सवार है चींटी ने दम नहीं किया हाथी के नाक में — Kartik Bhalerao
चलना सँभल सँभल के हबीबों के साथ तुम ठोकर न लगने देना मेरे एतिबार को — Kartik Bhalerao
अब तो पनाह दे मुझे दिल के मकान में सारा जहान जीत के आया हूँ तेरे पास — Kartik Bhalerao
उन्हें लगता हैं औरों की तरह मुझ को दिखा कर डर करेंगे वो मुझे ख़ामोश ऐसा हो नहीं सकता — Kartik Bhalerao
महार तो गए थे सिर्फ़ पाँच सौ लेकिन हज़ारों पेशवा का दम निचोड़ आए हैं — Kartik Bhalerao
ज़रूरी तो नहीं हर शख़्स मारा हो मोहब्बत का किसी का भूख के मारे भी चेहरा सूख जाता है — Kartik Bhalerao
बुज़दिल की तरह भागे हैं मैदान-ए-जंग से बाज़ी लगाने वाले थे जो अपनी जान की — Kartik Bhalerao
मोहब्बत की लकीरें गर हमारे हाथ में आएँ हैं ग़म जितने भी सीने में सभी औक़ात में आएँ — Kartik Bhalerao
कल तक जो मेरी ख़ूबियाँ गिनने में थे मसरूफ़ आज उन को मेरे ऐब नज़र आने लगे हैं — Kartik Bhalerao
खलने न दी कभी भी कमी वालिदैन की इतना किया है प्यार बड़े भाई ने मेरे — Kartik Bhalerao
अँधेरे का अगर मातम मनाते बैठ जाएँ हम कभी अपने क़बीले में उजाला हो नहीं सकता — Kartik Bhalerao
जाएँगे ख़ुद-ब-ख़ुद ही वो मैदान छोड़ के दीवाने भीम के सभी इक साथ देख कर — Kartik Bhalerao
ग़ैरत वो अपनी बेच के मशहूर क्या हुए बातें सुना रहे मुझे दुनिया जहान की — Kartik Bhalerao
क़लम की नोक पर बनता है हम जैसों का मुस्तक़बिल हमारा बुत-परस्ती से गुज़ारा हो नहीं सकता — Kartik Bhalerao
सियासत की लकीरें गर हमारे हाथ में आएँ हैं ग़म जितने भी मुफ़्लिस के सभी औक़ात में आएँ — Kartik Bhalerao

Ghazal

हमें अपनों से क्यूँँ लड़वा रहे हैं सियासत बीच में क्यूँँ ला रहे हैं मसाइल और भी हैं शहर में पर गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं हमारी नींद कब की उड़ गई है तुम्हारे दिन भी अच्छे आ रहे हैं ख़मोशी इस लिए भी बढ़ रही है ज़बाँ वाले तो मारे जा रहे हैं हमारे आशियाने तोड़ कर वो फ़रिश्तों के मकाँ बनवा रहे हैं बनाई चाय ऐसी मीडिया ने कमल के स्वाद जिस में आ रहे हैं ग़रीबी को मिटाने वाले थे जो ग़रीबों को मिटाते जा रहे हैं नज़र आते जहाँ से काम काले वहाँ पर्दे हरे लगवा रहे हैं नई नस्लों को मज़हब में फँसा कर क़लम से दूर करते जा रहे हैं किसानी ख़ुद-कुशी कर लेगी इक दिन किसानों पे वो दिन भी ला रहे हैं — Kartik Bhalerao
तेरी गली से जनाज़ा गुज़रने वाला है वो तेरी याद में घुट कर ही मरने वाला है गुनाहगार है दिल का सज़ा के क़ाबिल है वो बे-वफ़ा जो ज़बाँ से मुकरने वाला है कुछ इस तरह से दिखाया है ज़ख़्म-ए-दिल उस को मिलाते हाथ मोहब्बत से डरने वाला है ख़ुमार ऐसा चढ़ा है तेरे दिवाने को सुना है अब के तमाशा ही करने वाला है नसीब ऐसा सजाया है मैं ने सर अपने ये झुक गया तो मुक़द्दर बिखरने वाला है हज़ार ऐब छुपाता है अपने चेहरे के वो आइने की नज़र से उतरने वाला है कुछ ऐसी धूल पड़ी थी वफ़ा की मूरत पर धुला है अब के सरापा निखरने वाला है — Kartik Bhalerao
तलाशी के नतीजों से ये चेहरा सूख जाता है मैं मंज़िल तक पहुँचता हूँ तो दरिया सूख जाता है भला मेरी मोहब्बत से किसी का हो नहीं सकता मैं जिस पौधे को दूँ पानी वो पौधा सूख जाता है दर-ओ-दीवार तो घर के अभी मज़बूत हैं लेकिन कभी तूफ़ान आए तो कलेजा सूख जाता है मेरी गुड़िया की पेशानी घर आ कर चूम लेते ही मेरे दिन भर की मेहनत का पसीना सूख जाता है ज़रूरी तो नहीं हर शख़्स मारा हो मोहब्बत का किसी का भूख के मारे भी चेहरा सूख जाता है कड़कती धूप में माँ-बाप का साया ज़रूरी है अगर साया न हो सर पर तो बच्चा सूख जाता है — Kartik Bhalerao
वफ़ा की शर्ते जफ़ा की शर्ते अगर यही है अदा करेंगे वफ़ा के बदले वफ़ा करेंगे जफ़ा के बदले जफ़ा करेंगे ये ऐन क्या है ये शीन क्या है ये क़ाफ़ क्या है हमें पता है हमारा इस में हुआ न कुछ तो तुम्हारी ख़ातिर दुआ करेंगे किसे पता था किसे ख़बर थी गुमाँ हमारा ग़लत ही होगा तुम्हारे जाने के बा'द हम भी हँसी-ख़ुशी से जिया करेंगे वो महजबीं है वो रागनी है वो तो बला की हसीं है लेकिन ये दिल किसी से लगा नहीं तो तुम्हीं बताओ वो क्या करेंगे रहेंगे कब तक तुम्हारे ग़म में उदास चेहरा लिए हुए हम निकल के अब हम तुम्हारे ग़म से मोहब्बतों की दवा करेंगे तेरे इलावा भी इस नगर में कई सुख़न-वर भटक रहे हैं बुला के सब को सजा के महफ़िल नई ग़ज़ल हम सुना करेंगे निकाल फेंको पुराने पर्चे नई किताबों से तुम वगरना तुम्हारे बच्चे भी आह भर के हमारे क़िस्से पढ़ा करेंगे लगा के रक्खे अभी से पौधे ये छाँव देंगे मुसाफ़िरों को उन्हीं दरख़्तों पे फिर परिंदे बसा के दुनिया उड़ा करेंगे हम ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ पे मरना तो लाज़मी है मगर क़सम से सुख़नवरों के कलाम ज़िंदा रहा करेंगे — Kartik Bhalerao
क़दम रुकते ही रस्ते बोलते हैं चलो तो लोग अंधे बोलते हैं हमारे ज़िंदगी की दास्ताँ तो हमारे काले चश्में बोलते हैं दरख़्तों का बढ़ाया हुस्न हम ने नए मौसम के पत्ते बोलते हैं फ़रिश्ते भी पशेमाँ होते है जब दिवानों के करिश्में बोलते हैं सहारा दो मेरी परवाज़ को तुम हवाओं से परिंदे बोलते हैं जहाँ पे माहिर-ए-गुफ़्तार चुप हों वहाँ पर सिर्फ़ गूँगे बोलते हैं ख़मोशी याद आती है तेरी जब दिवाने पत्थरों से बोलते हैं सलीक़ा ही नहीं मालूम हम को बड़े लोगों से कैसे बोलते हैं ग़रीबी सर झुका के कह रही थी अमीरों के तो पैसे बोलते हैं — Kartik Bhalerao
ख़ुद को आज़माने में रूह को जलाने में तुझ को याद करने में तुझ को भूल जाने में दर्द को बढ़ाने में मुझ को यूँॅं सताने में ज़िक्र तेरा काफ़ी है दिल को यूँॅं दुखाने में इक क़दम ही काफ़ी था इक क़दम ही काफ़ी है फ़ासला मिटाने में राबता बढ़ाने में रंज-ओ-ग़म के पर्वत हैं रास्तों में काटे भी कोई आएगा कैसे इस ग़रीब-ख़ाने में साँस लेने की फ़ुर्सत तक नहीं मिली हम को इस क़दर गुज़ारी है ज़िंदगी कमाने में ईंट पत्थरों से तो बस मकान बनते हैं 'उम्रें बीत जाती हैं घर को घर बनाने में आप का कमाल-ए-फ़न देखा तो हुई हैरत आग को लगाने में आग को बुझाने में — Kartik Bhalerao
किसी का दिल दुखाया है किसी ने वफ़ा का सर झुकाया है किसी ने वफ़ा के अब नहीं क़ाबिल ये दुनिया यक़ीं मुझ को दिलाया है किसी ने जहाँ रहती थी दुनिया भर की ख़ुशियाँ वो मेरा घर जलाया है किसी ने खिलौना छीन कर हाथों से मेरे मेरा बचपन रुलाया है किसी ने तअल्लुक़ तोड़ कर मत जाओ अब तुम तुम्हें दिल से लगाया है किसी ने मैं हाल-ए-दिल सुनाता था जहाँ को मुझे शाइ'र बनाया है किसी ने क़यामत तक रहेंगे साथ दोनों किया वा'दा निभाया है किसी ने इबादत में जिसे तुम माँगते हो उसे पा कर गँवाया है किसी ने ख़ुशी से ख़ुद-कुशी करता है कोई उसे इतना सताया है किसी ने — Kartik Bhalerao
छत किसी का तो किसी का आसमाँ होने के बा'द आइने में देखता हूँ मेहरबाँ होने के बा'द सारी दुनिया में लुटाता हूँ मुहब्बत अपनी और ढूँढ़ता फिरता हूँ ख़ुद को राएगाँ होने के बा'द हम को बहनों की सदा माँ की दुआ भी है अज़ीज़ घर में मातम क्यूँँ मनाएँ बेटियाँ होने के बा'द मेरा दुख तो तेरे दुख से भी ज़ियादा है रक़ीब मैं ने तो औलाद खोई है जवाँ होने के बा'द बस मुझे इक ही गिला रह जाएगा आख़िर में यार चैन से सोया नहीं मैं आशियाँ होने के बा'द बस यही कह कर निकल आया हूँ तन्हा घर से मैं लौट कर आऊँगा इक दिन कारवाँ होने के बा'द — Kartik Bhalerao

Nazm

"ज़िम्मेदारी" ज़िम्मेदारी बच्चे की शरारतें खा गई बाप पी कर पड़ा रहा मय-ख़ाने में दवाइयों की क़ीमतें बीमार माँ को खा गई न घर का पता था न ठिकाना था ज़िन्दगी का न राहत थी न रास्ता था कोई मंज़िल का खिलौनों से खेलने की उम्र में खिलौनों को बेचने का हुनर आ गया दुनिया पूछती रही एक ही सवाल एक ही जवाब उम्र भर देता रहा बातों से पेट भरेगा क्या बिना माँ बाप के बच्चा पढ़ेगा क्या हालात को देख रोटी देने वालों वो बच्चा पढ़ना चाहता है कोई हाथों में क़लम देगा क्या बचपन काँटों पे गुज़रा जवानी में ज़मीं आई फिर किसी अनाथ को मेरी अज़ीयत पे दिल आया फिर वो दुल्हन बन के मेरे घर आई चार दीवारें एक छत तो थीं इस बार मगर माँं बाप के साए की कमी हमेशा खलती रही सत्तर फ़रिश्तों का साया हो जिस पे ऐसी औलाद बेटी की तौर पे इस ग़रीब के झोले में बरकत ले आई मज़ाक़ में ही सही पहली मर्तबा जब उस ने मेरा नाम पुकारा तो बेटी की आवाज़ में मुझे मेरी माँ नज़र आई — Kartik Bhalerao