ताक़त बता रहा हूँ तुम्हें संविधान की

संसद भवन में छा गई बेटी किसान की

माँ बाप पास हो गए हैं देखभाल में
बच्चों की बारी आ गई अब इम्तिहान की

तहज़ीब बाँध देती है मुझ को वगरना मैं
पगड़ी उछाल देता तेरे ख़ानदान की

अफ़सोस ऐसे दौर में पैदा हुए जहाँ
ज़िंदा हैं लोग मर गई क़ीमत ज़बान की

मज़दूर जब भी लौट के आते हैं अपने गाँव
ख़ुशियाँ ख़रीद लाते हैं दोनों जहान की

आँखें हमारी छीन के रस्ता दिखाए है
क्या ख़ूब मेहरबानी है उस मेहरबान की

सालार जब से कर रहा ख़ामोशी इख़्तियार
आवाज़ तब से बढ़ रही है बद-ज़बान की

— Kartik Bhalerao

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