Shakeel Jamali

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Shakeel Jamali shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shakeel Jamali's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ख़ुदा का शुक्र अदा कर वो बे-वफ़ा निकला ख़ुशी मना कि तिरी जान की बहाली हुई — Shakeel Jamali
हो गई है मिरी उजड़ी हुई दुनिया आबाद मैं उसे ढूँढ़ रहा हूँ ये बताने के लिए — Shakeel Jamali
अपने ख़ून से इतनी तो उम्मीदें हैं अपने बच्चे भीड़ से आगे निकलेंगे — Shakeel Jamali
ग़म के पीछे मारे मारे फिरना क्या ये दौलत तो घर बैठे आ जाती है — Shakeel Jamali
रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे — Shakeel Jamali
अगर हमारे ही दिल में ठिकाना चाहिए था तो फिर तुझे ज़रा पहले बताना चाहिए था — Shakeel Jamali
कुछ लोग हैं जो झेल रहे हैं मुसीबतें कुछ लोग हैं जो वक़्त से पहले बदल गए — Shakeel Jamali
उम्र का एक और साल गया वक़्त फिर हम पे ख़ाक डाल गया — Shakeel Jamali
सफ़र से लौट जाना चाहता है परिंदा आशियाना चाहता है — Shakeel Jamali
किसी से छोटी सी एक उम्मीद बाँध लीजिए मोहब्बतों का अगर जनाज़ा निकालना है — Shakeel Jamali
मैं ने हाथों से बुझाई है दहकती हुई आग अपने बच्चे के खिलौने को बचाने के लिए — Shakeel Jamali
शदीद गर्मी में कैसे निकले वो फूल-चेहरा सो अपने रस्ते में धूप दीवार हो रही है — Shakeel Jamali
सियासत के चेहरे पे रौनक़ नहीं ये औरत हमेशा की बीमार है — Shakeel Jamali
मसअला ख़त्म हुआ चाहता है दिल बस अब ज़ख़्म नया चाहता है — Shakeel Jamali
मौत को हम ने कभी कुछ नहीं समझा मगर आज अपने बच्चों की तरफ़ देख के डर जाते हैं — Shakeel Jamali
लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं इश्क़ में इतना ख़सारा है तो घर जाते हैं — Shakeel Jamali
सब से पहले दिल के ख़ाली-पन को भरना पैसा सारी उम्र कमाया जा सकता है — Shakeel Jamali
अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता वो देखो एक औरत आ रही है — Shakeel Jamali
वो अपने ख़ून से लिखने लगी है नाम मेरा अब इस मज़ाक़ को संजीदगी से लेना है — Shakeel Jamali

Ghazal

अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए अब मिरे पास ख़ज़ाना है लुटाने के लिए ऐसी दफ़्'अ' न लगा जिस में ज़मानत मिल जाए मेरे किरदार को चुन अपने निशाने के लिए किन ज़मीनों पे उतारोगे अब इमदाद का क़हर कौन सा शहर उजाड़ोगे बसाने के लिए मैं ने हाथों से बुझाई है दहकती हुई आग अपने बच्चे के खिलौने को बचाने के लिए हो गई है मिरी उजड़ी हुई दुनिया आबाद मैं उसे ढूँढ़ रहा हूँ ये बताने के लिए नफ़रतें बेचने वालों की भी मजबूरी है माल तो चाहिए दूकान चलाने के लिए जी तो कहता है कि बिस्तर से न उतरूँ कई रोज़ घर में सामान तो हो बैठ के खाने के लिए — Shakeel Jamali
कोई बहाना कोई कहानी नहीं चलेगी मोहब्बतों में ग़लत-बयानी नहीं चलेगी मुनाफ़िक़ों पर वफ़ा का तमग़ा नहीं सजेगा ख़राब कपड़े पे कामदानी नहीं चलेगी हमें ये दुनिया ख़राब समझे ये उस की मर्ज़ी मगर सबूतों से छेड़खानी नहीं चलेगी बड़ों के नक्श-ए-क़दम पे बच्चे न चल सकेंगे पुरानी पटरी पे राजधानी नहीं चलेगी अगर वो अपनी ज़री की साड़ी पहन के निकली तो यार लोगों पे शेरवानी नहीं चलेगी वो महफ़िलें जो बग़ैर उजरत की खिदमतें हैं तो क्या वहाँ भी ग़ज़ल पुरानी नहीं चलेगी बहुत ज़ियादा भी मुत्मइन मत दिखाई देना बिछड़ते लम्हों में शादवानी नहीं चलेगी — Shakeel Jamali