Shakeel Jamali

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    बोलता है तो पता लगता है
    ज़ख़्म उसका भी हरा लगता है

    रास आ जाती है तन्हाई भी
    एक दो रोज़ बुरा लगता है

    कितनी ज़ालिम है मोहज्जब दुनिया
    घर से निकलो तो पता लगता है

    आज भी वो नहीं आने वाला
    आज का दिन भी गया लगता है

    बोझ सीने पे बहुत है लेकिन
    मुस्कुरा देने में क्या लगता है

    मूड अच्छा हो तो सब अच्छा है
    वर्ना हँसना भी बुरा लगता है

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    दिल उसकी मोहब्बत में परेशान तो होगा
    अब आग से खेलोगे तो नुक़सान तो होगा

    वादे पे न आओगे तो तफ़्तीश तो होगी
    कानून को तोड़ोगे तो चालान तो होगा

    हमने तो उसे एक अँगूठी भी नहीं दी
    वो ताज-महल देख के हैरान तो होगा

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    किसी से छोटी सी एक उम्मीद बांध लीजिए
    मोहब्बतों का अगर जनाज़ा निकालना है

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    खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है
    लेकिन उस को फिर समझाया जा सकता है

    इस दुनिया में हम जैसे भी रह सकते हैं
    इस दलदल पर पाँव जमाया जा सकता है

    सब से पहले दिल के ख़ाली-पन को भरना
    पैसा सारी उम्र कमाया जा सकता है

    मैं ने कैसे कैसे सदमे झेल लिए हैं
    इस का मतलब ज़हर पचाया जा सकता है

    इतना इत्मिनान है अब भी उन आँखों में
    एक बहाना और बनाया जा सकता है

    झूट में शक की कम गुंजाइश हो सकती है
    सच को जब चाहो झुठलाया जा सकता है

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    सफ़र से लौट जाना चाहता है
    परिंदा आशियाना चाहता है

    कोई स्कूल की घंटी बजा दे
    ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है

    उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया
    जो दो पैसे कमाना चाहता है

    यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं
    वो पागल ज़हर खाना चाहता है

    जिसे भी डूबना हो डूब जाए
    समुंदर सूख जाना चाहता है

    हमारा हक़ दबा रक्खा है जिस ने
    सुना है हज को जाना चाहता है

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    रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे
    हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे

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    उम्र का एक और साल गया
    वक़्त फिर हम पे ख़ाक डाल गया

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    अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता
    वो देखो एक औरत आ रही है

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    सफ़र से लौट जाना चाहता है
    परिंदा आशियाना चाहता है

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    वो अपने खून से लिखने लगी है नाम मेरा
    अब इस मज़ाक को संजीदगी से लेना है

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