umr ka ek aur saal gaya | उम्र का एक और साल गया

  - Shakeel Jamali

उम्र का एक और साल गया
वक़्त फिर हम पे ख़ाक डाल गया

  - Shakeel Jamali

Budhapa Shayari

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    कोई सवाल ज़िंदगी का हल नहीं हुआ
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    बोलता है तो पता लगता है
    ज़ख़्म उसका भी हरा लगता है

    रास आ जाती है तन्हाई भी
    एक दो रोज़ बुरा लगता है

    कितनी ज़ालिम है मोहज्जब दुनिया
    घर से निकलो तो पता लगता है

    आज भी वो नहीं आने वाला
    आज का दिन भी गया लगता है

    बोझ सीने पे बहुत है लेकिन
    मुस्कुरा देने में क्या लगता है

    मूड अच्छा हो तो सब अच्छा है
    वर्ना हँसना भी बुरा लगता है
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    Shakeel Jamali
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    सफ़र से लौट जाना चाहता है
    परिंदा आशियाना चाहता है
    Shakeel Jamali
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    सफ़र से लौट जाना चाहता है
    परिंदा आशियाना चाहता है

    कोई स्कूल की घंटी बजा दे
    ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है

    उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया
    जो दो पैसे कमाना चाहता है

    यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं
    वो पागल ज़हर खाना चाहता है

    जिसे भी डूबना हो डूब जाए
    समुंदर सूख जाना चाहता है

    हमारा हक़ दबा रक्खा है जिस ने
    सुना है हज को जाना चाहता है
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    Shakeel Jamali
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    थोड़ा सा माहौल बनाना होता है
    वर्ना किसके साथ ज़माना होता है

    आँसू पहली शर्त है ज़िंदा रहने की
    ग़म तो साँसों का जुर्माना होता है

    सच्चा शेर सुनाने वाले ख़त्म हुए
    अब तो ख़ाली खेल दिखाना होता है

    रात हमारे घर जल्दी आ जाया कर
    हमें सवेरे काम पे जाना होता है

    लाल-क़िले की दीवारों पर लिखवा दो
    दिल सब से महफ़ूज़ ठिकाना होता है

    दुनिया में भर-मार है नक़ली लोगों की
    सौ में कोई एक दिवाना होता है
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    Shakeel Jamali
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    उलटे सीधे सपने पाले बैठे हैं
    सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं
    Shakeel Jamali
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