Kartik Bhalerao

Top 10 of Kartik Bhalerao

    दौड़ना हमें भी अज़ाब था
    चलना एक लँगड़े का ख़्वाब था

    आरज़ू घटा कर भी देखते
    ख़ुशियों का तो सीधा हिसाब था
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    चल रही ये ज़िंदगी बेज़ार है
    ऐसे जीना भी मुझे दुश्वार है

    अब तो लाज़िम है बग़ावत पे उतर
    जेब ख़ाली और भरा बाज़ार है
    इश्क़ में जो मर गया आशिक़ वही
    इश्क़ में जो बच गया ग़द्दार है

    गाँव की कच्ची सी गलियाँ कह रहीं
    शहर का ये रास्ता बेकार है

    अब कहेंगी कैसे वो इनकार है
    सोने सा दिल हीरे से इज़हार है

    अपनी आज़ादी से पछताने लगा
    वो जिसे इस ज़िंदगी से प्यार है

    चारासाज़ी से शिफ़ा मिलती नहीं
    क्या करेगा ज़ेहन जब बीमार है
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    अदाओं पे उन की यूँ मर जाने वाले
    हैं ये रास्ते दिल को बहलाने वाले

    तू मरना नहीं इश्क़ में डूबने को
    हैं ये काम मर के भी पछताने वाले

    तिरे दर पे आ कर तो हम ने भी देखा
    वहाँ कितने थे झोली फैलाने वाले

    बिताए हुए लम्हें मरते नहीं हैं
    मुझे याद आते हैं याद आने वाले

    खिला तेरे आँगन में इक फूल है अब
    तू भी देखना फूल मुरझाने वाले

    किसी से हो मुझ सा भी वो इश्क़ तुझ को
    मेरे हाल-ए-दिल पे यूँ इतराने वाले

    तेरी प्यास से मैं नहीं डरने वाला
    चला जा समुंदर से टकराने वाले

    बताया नहीं राज़ अपनी ख़ुशी का
    वफ़ा और दौलत को ठुकराने वाले
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    ये सोच कर दिन रात रोता है कोई
    दिल से बड़ा भी तोहफ़ा होता है कोई

    उस की वफ़ा दौलत के आगे मर गई
    क़ातिल मोहब्बत का भी होता है कोई

    सिन्दूर तेरा देख कर जल जाएँगे
    कहना ये तेरे साथ सोता है कोई

    उम्मीद है ये दिल लगेगा एक दिन
    बंजर ज़मीं पे इश्क़ बोता है कोई

    ख़ुद-ग़र्ज़ दुनिया में बड़ा दुख होता है
    जब साहिब-ए-दिल तुझ सा खोता है कोई

    वो चाँद आएगा ज़मीं पे टूट कर
    ता'बीर ख़्वाबों की पिरोता है कोई
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    हाल-ए-दिल सुनते रहे हम तुम को अपना मान कर
    प्यासे राही को ख़बर थी तिश्नगी क्या चीज़ है

    ख़्वाब महलों के न देखे उन की आँखों में कभी
    उन की बातों ने बताया सादगी क्या चीज़ है
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    तू मरना नहीं इश्क़ में डूबने को
    है ये काम मर के भी पछताने वाले

    बताया नहीं राज़ चैन-ओ-सुकूँ का
    वफ़ा और दौलत को ठुकराने वाले
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    उम्मीद है ये दिल लगेगा एक दिन
    बंजर ज़मीं पे इश्क़ बोता है कोई

    ख़ुद-ग़र्ज़ दुनियाँ में बड़ा दुख होता है
    जब साहिब-ए-दिल तुझ सेा खोता है कोई
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    ये सोच कर दिन रात रोता है कोई
    दिल से बड़ा भी तोहफ़ा होता है कोई

    उस की वफ़ा दौलत के आगे मर गई
    क़ातिल मोहब्बत का भी होता है कोई
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    "ज़िम्मेदारी"
    ज़िम्मेदारी बच्चे की शरारतें खा गई
    बाप पी कर पड़ा रहा मय-ख़ाने में
    दवाइयों की क़ीमतें बीमार माँ को खा गई
    न घर का पता था न ठिकाना था ज़िन्दगी का
    राहत थी न रास्ता था कोई मंज़िल का
    खिलौनों से खेलने की उम्र में
    खिलौनों को बेचने का हुनर आ गया
    दुनिया पूछती रही एक ही सवाल
    एक ही जवाब उम्र भर देता रहा
    बातों से पेट भरेगा क्या
    बिना माँ बाप के बच्चा पढ़ेगा क्या
    हालात को देख रोटी देने वालों वो बच्चा
    पढ़ना चाहता है कोई हाथों में क़लम देगा क्या
    बचपन काँटों पे गुज़रा जवानी में ज़मीं आई
    फिर किसी अनाथ को मेरी अज़ीयत पे दिल आया
    फिर वो दुल्हन बन के मेरे घर आई
    चार दीवारें एक छत तो थीं इस बार मगर
    माँं बाप के साए की कमी हमेशा खलती रही
    सत्तर फ़रिश्तों का साया हो जिस पे
    ऐसी औलाद बेटी की तौर पे
    इस ग़रीब के झोले में बरकत ले आई
    मज़ाक़ में ही सही
    पहली मर्तबा जब उस ने मेरा नाम पुकारा
    तो बेटी की आवाज़ में मुझे मेरी माँ नज़र आई
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