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हमेशा ही बड़ी प्यारी बहुत अच्छी
कभी ग़ुस्सा नहीं दादी बहुत अच्छी
कभी ग़ुस्सा नहीं दादी बहुत अच्छी
डरा था ख़्वाब में सो आके दादी ने
सुनाई ख़्वाब में लोरी बहुत अच्छी
थकी थी बोल से वो खेलकर फिर भी
वो मेरे साथ फिर खेली बहुत अच्छी
किसी जिद को मेरी वो मानती थी जब
मैं कहता था मेरी बच्ची बहुत अच्छी
कोई भी मर्ज़ हो सकती नहीं मुझ को
ख़ुदा बन उस ने मालिश की बहुत अच्छी
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दिल से मुझे उस को भुलाना है अभी
सो फूल इक प्यारा लगाना है अभी
सो फूल इक प्यारा लगाना है अभी
कुछ ऐसे उस ने तोहफा माना नहीं
ये गिफ़्ट रक्खो घर में जाना है अभी
होता नहीं अब सब्र शब है ये तो क्या
खोलो ये खिड़की मुझ को आना है अभी
बातें छुपाना बंद कर दो हर्ष तुम
इज़हार करने का ज़माना है अभी
हम ही मनाएंगे भी पर पहले तो
इक नाम से उस को जलाना है अभी
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