चल रही ये ज़िंदगी बेज़ार है
ऐसे जीना भी मुझे दुश्वार है
अब तो लाज़िम है बग़ावत पे उतर
जेब ख़ाली और भरा बाज़ार है
इश्क़ में जो मर गया आशिक़ वही
इश्क़ में जो बच गया ग़द्दार है
गाँव की कच्ची सी गलियाँ कह रहीं
शहर का ये रास्ता बेकार है
अब कहेंगी कैसे वो इनकार है
सोने सा दिल हीरे से इज़हार है
अपनी आज़ादी से पछताने लगा
वो जिसे इस ज़िंदगी से प्यार है
चारासाज़ी से शिफ़ा मिलती नहीं
क्या करेगा ज़ेहन जब बीमार है
— Kartik Bhalerao















