Pravendra Anuragi

Pravendra Anuragi

@pravendraanuragi17

Pravendra Anuragi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Pravendra Anuragi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कोई सिखाए हम को उजालों का एहतिराम मुद्दत हुई अँधेरे में रहते हुए हमें — Pravendra Anuragi
आख़िरी रस्म भी ये आज निभा लेते हैं शुक्रिया दोस्त चलो हम भी विदा लेते हैं — Pravendra Anuragi
जो बात मिरी हार के मंज़र में है जानी वो बात तेरी जीत के मंज़र में नहीं है — Pravendra Anuragi
मैं किसी रोज़ रोऊँगा इतना कि फिर कोई यादों का मंज़र दिखाई न दे — Pravendra Anuragi
मकाँ टूटे फटे सर और ज़मीं ख़ूँ से नहाई है ये आज़ादी बड़ी मेहनत से पुरखों ने कमाई है — Pravendra Anuragi
मुड़ के भी देखा नहीं जाते हुए उस ने हमें रह गई होगी कमी कोई पज़ीराई में — Pravendra Anuragi

Ghazal

उम्र भर को बस यही इक इम्तिहाँ बाक़ी रहा इक अजब रिश्ता हमारे दरमियाँ बाक़ी रहा वो इमारत जो बहुत ऊँची थी इक दिन ढह गई कुछ नहीं बाक़ी रहा बस ख़ाक-दाँ बाक़ी रहा हाथ मेरे छू नहीं पाए कभी उस को मगर रूह पे मेरी मुहब्बत का निशाँ बाक़ी रहा बद्दुआ में आग थी और आग में ताक़त बहुत जल गया सब कुछ न कोई भी निशाँ बाक़ी रहा मंजिलें गुम हैं कहीं और हम-सफ़र भी खो गए रास्तों को कोसना भी अब कहाँ बाक़ी रहा कुछ सुनहरे ख़्वाब आ कर बोलते हैं कान में किस तरह से कुछ उमीदों को मकाँ बाक़ी रहा बे-रुखी तुम से अभी आसान है मुझ को बहुत अब न कोई भी वफ़ा का आशियाँ बाक़ी रहा — Pravendra Anuragi
आशिक़ अपनी विरासत सँभाले रहें ज़ख़्म खाते रहें मुस्कुराते रहें सच के पाले में हम भी तो कैसे रहें चाहते हैं यही हम कि जीते रहें उम्र भर तेरे आँचल से लिपटे रहें हम सदा तेरी नज़रों में बच्चे रहें है बिगाड़ा हमें सोहबत-ए- चाँद ने हम वगरना शबों में तो घर पे रहें क़ुर्बतों में बस इतनी ही दूरी रहे ज़ख़्म महबूब के हम को दिखते रहें तू जो मिलने लगी है मुहब्बत से अब हम मुक़द्दर के मारे भी कैसे रहें हों लिखे काँटे अपने मुक़द्दर में पर फूल उस के बग़ीचे में खिलते रहें आइनों से तक़ाज़ा नहीं है कोई बस हमारे मुताबिक़ ये चलते रहें — Pravendra Anuragi
इस क़दर भा गई है इश्क़ में तन्हाई हमें तेरी बाहों में भी फिर नींद नहीं आई हमें जब से सूखे हैं निगाहों से हमारे आँसू तोड़ पाई है कहाँ कोई भी रुसवाई हमें दे गई फिर से नए ज़ख़्म बड़ी शिद्दत से ग़ैर की बाहों में लिपटी तेरी परछाई हमें डूबते वक़्त किसी को न पुकारा हम ने देखते रह गए साहिल के तमाशाई हमें छोड़ के जा तू हमें और पता चलने दे कौन से मरहले पे ले गई बरनाई हमें डूबने पर ही तो मालूम हुई है जानाँ तेरी हँसती हुई आँखों की ये गहराई हमें रास्ते क़ीमती भी होते हैं आख़िर ये बात आज मंज़िल पे पहुँच कर ही समझ आई हमें — Pravendra Anuragi
कभी जब अपने घर की याद आती है परिंदों को भी आज़ादी सताती है मुझे वैसे तो कोई ग़म नहीं है बस मुझे हर रोज़ उस की याद आती है मुझे हर रोज़ जबरन जीना पड़ता है मिरी ये ज़ीस्त ग़म ही ग़म लुटाती है उसे इन पत्थरों से क्यूँँ न हो वहशत वो भी तो ख़्वाब शीशे के सजाती है चराग़ों को शिकायत है तो बस इतनी हवा हर दफ़्अ उन को भूल जाती है ग़मों से गहरे रिश्ते हो चले मेरे ज़ियादा अब ख़ुशी मुझ को रुलाती है अलग ही बोझ हूँ इस ज़िंदगी पे मैं ये तुर्बत देख मुझ को मुस्कुराती है अगर बीमार हूँ तो रहने दो मुझ को दवा क्यूँँ मेरी चौखट खटखटाती है मिटाता हूँ वफ़ा के क़िस्से पन्नों से मुहब्बत की सियाही अब सताती है नज़र-अंदाज़ मैं कर ही नहीं सकता उसी की बाहों में अब नींद आती है ख़मोशी उस के चेहरे पे नहीं सजती वो अच्छी लगती है जब गीत गाती है कभी महताब सच को रौशनी देगा इसी उम्मीद में शब बीत जाती है — Pravendra Anuragi
जितने मौसम भी अभी तक के सुहाने आए सब के सब ही तो मिरे दिल को दुखाने आए जीते जी दे न सके रोने पे काँधा अपना वक़्त-ए-रुख़्सत पे वही लोग उठाने आए मैं खिलौना लिए बैठा रहा उम्मीद में पर फिर कहाँ लौट के बचपन के ज़माने आए जो कभी जुस्तजू-ए-रौशनी में थे यकसर क्यों वही लोग चराग़ों को बुझाने आए मैं तिरा दर्द मिरा दर्द समझ कर रो लूँ पर कभी तू भी मिरे दर्द मिटाने आए आज़माते हुए जब उम्र गुज़ारी जा चुकी तब कहीं जा के मिरे होश ठिकाने आए अपने क़ातिल से गुज़ारिश है मिरी बस इतनी कि वही ख़ुद मेरी तुर्बत भी सजाने आए एक मुद्दत है हुई तर्क-ए-मुहब्बत को मगर याद आई तो कई दर्द पुराने आए — Pravendra Anuragi
तुम यक़ीं करते नहीं भूलने भुलाने में किस तरह तुम जी रहे हो नए ज़माने में हर भरोसे का जज़ीरा फिसल गया इक दिन हाथ शामिल थे मिरे ही मुझे डुबाने में ये बिछड़ते हुए चेहरे हमें बताते हैं वक़्त लगता है बहुत ख़्वाब इक सजाने में ये नया दोस्त मेरी जीत की वजह है अभी हो न जाए कहीं शामिल मुझे हराने में दिल दुखाने को घड़ी भर की बात काफ़ी है उम्र लगती है मियाँ दिल से मुस्कुराने में इन हवाओं से कभी दुश्मनी नहीं रक्खी सो दिये जलते थे हर शाम आशियाने में इस तरह से उसे हर रोज़ ढूँढ़ता हूँ मैं जैसे वो आख़िरी ही हर्फ़ हो तराने में — Pravendra Anuragi
वर्ना तो है ही क्या जो मिरे घर में नहीं है पर चाहिए जो शख़्स मुक़द्दर में नहीं है हर रोज़ सताती है यही बात मुझे तो क्यूँ बेहतरी उस की मेरे बेहतर में नहीं है इक बार भी सोचे कभी घर तोड़ने के बा'द इतनी सी मुहब्बत भी सितमगर में नहीं है ढोता हूँ सभी ज़ख़्म यही सोच के मैं तो जो बात तेरे ढब में है ख़ंजर में नहीं है तुम लूट के ले जाते हो साहिल के ख़ज़ाने फिर सोचते हो नर्मी समंदर में नहीं है कह देता है क्यूँ शे'र वो हालात पे मेरे क्या थोड़ी सी भी अक़्ल सुख़न-वर में नहीं है हर रोज़ यही सोच के जाता हूँ कमाने ग़ुर्बत मेरे बच्चों के मुक़द्दर में नहीं है — Pravendra Anuragi
मिरे घर में मुहब्बत का हर इक सामान बाक़ी है तिरा ग़म है नशा है और मुझ में जान बाक़ी है मिरे दिल में यही इक आख़िरी अरमान बाक़ी है अभी तुझ पे लिखी इक नज़्म का उन्वान बाक़ी है ये उम्र-ए-इंतिज़ार-ए-इश्क़ बढ़ती ही रहेगी यूँ तिरे लौट आने का जब तक कोई इम्कान बाक़ी है मिटाएगा कहाँ तक तू मिरे दिल के उजालों को मेरी नज़रों में अब भी एक रौशनदान बाक़ी है गुज़रते दौर ने मुझ को यही इक बात समझाई जहाँ दरबान ज़िंदा है वहीं ईमान बाक़ी है मुहब्बत के मकाँ तो ढह गए सब दिल मुहल्ले में तुझे जो आना है तो आ बस इक दालान बाक़ी है — Pravendra Anuragi