जब अश्क आँखों से जुदा होने लगे
तो ग़म मिरे मुझ से ख़फ़ा होने लगे
जिन पत्थरों को ज़िंदगी ने मौत दी
बेजान वो पत्थर ख़ुदा होने लगे
तुम ने मिरे ज़ख़्मों को यूँ छू क्या लिया
फिर ज़ख़्म तो जैसे हवा होने लगे
जब से मिरी आँखों की बीनाई गई
घर के दिए भी बे-वफ़ा होने लगे
उन को ज़रूरत ही नहीं है अब मिरी
अब काम जो मेरे बिना होने लगे
हम ने जिसे भी फिर दु'आओं में पढ़ा
उस के लिए हम बद-दु'आ होने लगे
तेरे अलावा सिर्फ़ तू था ज़ीस्त में
अब सब मिरे तेरे सिवा होने लगे
— Pravendra Anuragi















