कभी जब अपने घर की याद आती है
परिंदों को भी आज़ादी सताती है
मुझे वैसे तो कोई ग़म नहीं है बस
मुझे हर रोज़ उस की याद आती है
मुझे हर रोज़ जबरन जीना पड़ता है
मिरी ये ज़ीस्त ग़म ही ग़म लुटाती है
उसे इन पत्थरों से क्यूँ न हो वहशत
वो भी तो ख़्वाब शीशे के सजाती है
चराग़ों को शिकायत है तो बस इतनी
हवा हर दफ़्अ उन को भूल जाती है
ग़मों से गहरे रिश्ते हो चले मेरे
ज़ियादा अब ख़ुशी मुझ को रुलाती है
अलग ही बोझ हूँ इस ज़िंदगी पे मैं
ये तुर्बत देख मुझ को मुस्कुराती है
अगर बीमार हूँ तो रहने दो मुझ को
दवा क्यूँ मेरी चौखट खटखटाती है
मिटाता हूँ वफ़ा के क़िस्से पन्नों से
मुहब्बत की सियाही अब सताती है
नज़र-अंदाज़ मैं कर ही नहीं सकता
उसी की बाहों में अब नींद आती है
ख़मोशी उस के चेहरे पे नहीं सजती
वो अच्छी लगती है जब गीत गाती है
कभी महताब सच को रौशनी देगा
इसी उम्मीद में शब बीत जाती है















