"ज़िम्मेदारी"
ज़िम्मेदारी बच्चे की शरारतें खा गई
बाप पी कर पड़ा रहा मय-ख़ाने में
दवाइयों की क़ीमतें बीमार माँ को खा गई
न घर का पता था न ठिकाना था ज़िन्दगी का
न राहत थी न रास्ता था कोई मंज़िल का
खिलौनों से खेलने की उम्र में
खिलौनों को बेचने का हुनर आ गया
दुनिया पूछती रही एक ही सवाल
एक ही जवाब उम्र भर देता रहा
बातों से पेट भरेगा क्या
बिना माँ बाप के बच्चा पढ़ेगा क्या
हालात को देख रोटी देने वालों वो बच्चा
पढ़ना चाहता है कोई हाथों में क़लम देगा क्या
बचपन काँटों पे गुज़रा जवानी में ज़मीं आई
फिर किसी अनाथ को मेरी अज़ीयत पे दिल आया
फिर वो दुल्हन बन के मेरे घर आई
चार दीवारें एक छत तो थीं इस बार मगर
माँं बाप के साए की कमी हमेशा खलती रही
सत्तर फ़रिश्तों का साया हो जिस पे
ऐसी औलाद बेटी की तौर पे
इस ग़रीब के झोले में बरकत ले आई
मज़ाक़ में ही सही
पहली मर्तबा जब उस ने मेरा नाम पुकारा
तो बेटी की आवाज़ में मुझे मेरी माँ नज़र आई















