रिवायतों की सफ़ें कब की छोड़ आए हैंहम अपना रिश्ता तथागत से जोड़ आए हैंजो रोकता था हमारी उड़ान को हर वक़्तहम ऐसे धर्म की ज़ंजीर तोड़ आए हैं— Kartik Bhalerao " Asad "