Allama Iqbal

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📍 Lahore· Pakistan

Allama Iqbal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Allama Iqbal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में — Allama Iqbal
ढूँढ़ता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने आप को आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं — Allama Iqbal
आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं महव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी — Allama Iqbal
ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें — Allama Iqbal
सौ सौ उमीदें बँधती है इक इक निगाह पर मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई — Allama Iqbal
दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है — Allama Iqbal
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा — Allama Iqbal
ऐ ताइर-ए-लाहूती उस रिज़्क़ से मौत अच्छी जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही — Allama Iqbal
फिर उठी आख़िर सदा तौहीद की पंजाब से हिन्द को इक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख़्वाब से — Allama Iqbal
न पूछो मुझ से लज़्ज़त ख़ानमाँ-बर्बाद रहने की नशेमन सैकड़ों मैं ने बना कर फूँक डाले हैं — Allama Iqbal
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो — Allama Iqbal
हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं — Allama Iqbal
नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना — Allama Iqbal
जीना वो क्या जो हो नफ़स-ए-ग़ैर पर मदार शोहरत की ज़िंदगी का भरोसा भी छोड़ दे — Allama Iqbal
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा — Allama Iqbal
है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़ अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद — Allama Iqbal
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा — Allama Iqbal
इश्क़ तिरी इंतिहा इश्क़ मिरी इंतिहा तू भी अभी ना-तमाम मैं भी अभी ना-तमाम — Allama Iqbal
तू ने ये क्या ग़ज़ब किया मुझ को भी फ़ाश कर दिया मैं ही तो एक राज़ था सीना-ए-काएनात में — Allama Iqbal

Ghazal

कुशादा दस्त-ए-करम जब वो बे-नियाज़ करे नियाज़-मंद न क्यूँँ आजिज़ी पे नाज़ करे बिठा के अर्श पे रक्खा है तू ने ऐ वाइ'ज़ ख़ुदा वो क्या है जो बंदों से एहतिराज़ करे मिरी निगाह में वो रिंद ही नहीं साक़ी जो होशियारी ओ मस्ती में इम्तियाज़ करे मुदाम गोश-ब-दिल रह ये साज़ है ऐसा जो हो शिकस्ता तो पैदा नवा-ए-राज़ करे कोई ये पूछे कि वाइ'ज़ का क्या बिगड़ता है जो बे-अमल पे भी रहमत वो बे-नियाज़ करे सुख़न में सोज़ इलाही कहाँ से आता है ये चीज़ वो है कि पत्थर को भी गुदाज़ करे तमीज़-ए-लाला-ओ-गुल से है नाला-ए-बुलबुल जहाँ में वा न कोई चश्म-ए-इम्तियाज़ करे ग़ुरूर-ए-ज़ोहद ने सिखला दिया है वाइ'ज़ को कि बंदगान-ए-ख़ुदा पर ज़बाँ दराज़ करे हवा हो ऐसी कि हिन्दोस्ताँ से ऐ 'इक़बाल' उड़ा के मुझ को ग़ुबार-ए-रह-ए-हिजाज़ करे — Allama Iqbal
ए'जाज़ है किसी का या गर्दिश-ए-ज़माना टूटा है एशिया में सेहर-ए-फ़िरंगियाना तामीर-ए-आशियाँ से मैं ने ये राज़ पाया अह्ल-ए-नवा के हक़ में बिजली है आशियाना ये बंदगी ख़ुदाई वो बंदगी गदाई या बंदा-ए-ख़ुदा बन या बंदा-ए-ज़माना ग़ाफ़िल न हो ख़ुदी से कर अपनी पासबानी शायद किसी हरम का तू भी है आस्ताना ऐ ला इलाह के वारिस बाक़ी नहीं है तुझ में गुफ़्तार-ए-दिलबराना किरदार-ए-क़ाहिराना तेरी निगाह से दिल सीनों में काँपते थे खोया गया है तेरा जज़्ब-ए-क़लंदराना राज़-ए-हरम से शायद 'इक़बाल' बा-ख़बर है हैं इस की गुफ़्तुगू के अंदाज़ महरमाना — Allama Iqbal
समा सकता नहीं पहना-ए-फ़ितरत में मिरा सौदा ग़लत था ऐ जुनूँ शायद तिरा अंदाज़ा-ए-सहरा ख़ुदी से इस तिलिस्म-ए-रंग-ओ-बू को तोड़ सकते हैं यही तौहीद थी जिस को न तू समझा न मैं समझा निगह पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल तजल्ली ऐन-ए-फ़ितरत है कि अपनी मौज से बेगाना रह सकता नहीं दरिया रक़ाबत इल्म ओ इरफ़ाँ में ग़लत-बीनी है मिम्बर की कि वो हल्लाज की सूली को समझा है रक़ीब अपना ख़ुदा के पाक बंदों को हुकूमत में ग़ुलामी में ज़िरह कोई अगर महफ़ूज़ रखती है तो इस्तिग़्ना न कर तक़लीद ऐ जिबरील मेरे जज़्ब-ओ-मस्ती की तन-आसाँ अर्शियों को ज़िक्र ओ तस्बीह ओ तवाफ़ औला बहुत देखे हैं मैं ने मशरिक़ ओ मग़रिब के मय-ख़ाने यहाँ साक़ी नहीं पैदा वहाँ बे-ज़ौक़ है सहबा न ईराँ में रहे बाक़ी न तूराँ में रहे बाक़ी वो बंदे फ़क़्र था जिन का हलाक-ए-क़ैसर-ओ-किसरा यही शैख़-ए-हरम है जो चुरा कर बेच खाता है गलीम-ए-बूज़र ओ दलक़-ए-उवेस ओ चादर-ए-ज़हरा हुज़ूर-ए-हक़ में इस्राफ़ील ने मेरी शिकायत की ये बंदा वक़्त से पहले क़यामत कर न दे बरपा निदा आई कि आशोब-ए-क़यामत से ये क्या कम है ' गिरफ़्ता चीनियाँ एहराम ओ मक्की ख़ुफ़्ता दर बतहा लबालब शीशा-ए-तहज़ीब-ए-हाज़िर है मय-ए-ला से मगर साक़ी के हाथों में नहीं पैमाना-ए-इल्ला दबा रक्खा है इस को ज़ख़्मा-वर की तेज़-दस्ती ने बहुत नीचे सुरों में है अभी यूरोप का वावैला इसी दरिया से उठती है वो मौज-ए-तुंद-जौलाँ भी नहंगों के नशेमन जिस से होते हैं तह-ओ-बाला ग़ुलामी क्या है ज़ौक़-ए-हुस्न-ओ-ज़ेबाई से महरूमी जिसे ज़ेबा कहें आज़ाद बंदे है वही ज़ेबा भरोसा कर नहीं सकते ग़ुलामों की बसीरत पर कि दुनिया में फ़क़त मर्दान-ए-हूर की आँख है बीना वही है साहिब-ए-इमरोज़ जिस ने अपनी हिम्मत से ज़माने के समुंदर से निकाला गौहर-ए-फ़र्दा फ़रंगी शीशागर के फ़न से पत्थर हो गए पानी मिरी इक्सीर ने शीशे को बख़्शी सख़्ती-ए-ख़ारा रहे हैं और हैं फ़िरऔन मेरी घात में अब तक मगर क्या ग़म कि मेरी आस्तीं में है यद-ए-बैज़ा वो चिंगारी ख़स-ओ-ख़ाशाक से किस तरह दब जाए जिसे हक़ ने किया हो नीस्ताँ के वास्ते पैदा मोहब्बत ख़ेशतन बीनी मोहब्बत ख़ेशतन दारी मोहब्बत आस्तान-ए-क़ैसर-ओ-किसरास बे-परवा अजब क्या गर मह ओ परवीं मिरे नख़चीर हो जाएँ कि बर फ़ितराक-ए-साहिब दौलत-ए-बस्तम सर-ए-ख़ुद रा वो दाना-ए-सुबुल ख़त्मुर-रुसुल मौला-ए-कुल जिस ने ग़ुबार-ए-राह को बख़्शा फ़रोग़-ए-वादी-ए-सीना निगाह-ए-इश्क़ ओ मस्ती में वही अव्वल वही आख़िर वही क़ुरआँ वही फ़ुरक़ाँ वही यासीं वही ताहा 'सनाई' के अदब से मैं ने ग़व्वासी न की वर्ना अभी इस बहर में बाक़ी हैं लाखों लूलू-ए-लाला — Allama Iqbal
अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तिरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं कह गईं राज़-ए-मोहब्बत पर्दा-दारी-हा-ए-शौक़ थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं थी किसी दरमाँदा रह-रौ की सदा-ए-दर्दनाक जिस को आवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँ समझा था मैं — Allama Iqbal
असर करे न करे सुन तो ले मिरी फ़रियाद नहीं है दाद का तालिब ये बंदा-ए-आज़ाद ये मुश्त-ए-ख़ाक ये सरसर ये वुसअ'त-ए-अफ़्लाक करम है या कि सितम तेरी लज़्ज़त-ए-ईजाद ठहर सका न हवा-ए-चमन में ख़ेमा-ए-गुल यही है फ़स्ल-ए-बहारी यही है बाद-ए-मुराद क़ुसूर-वार ग़रीब-उद-दयार हूँ लेकिन तिरा ख़राबा फ़रिश्ते न कर सके आबाद मिरी जफ़ा-तलबी को दुआएँ देता है वो दश्त-ए-सादा वो तेरा जहान-ए-बे-बुनियाद ख़तर-पसंद तबीअत को साज़गार नहीं वो गुल्सिताँ कि जहाँ घात में न हो सय्याद मक़ाम-ए-शौक़ तिरे क़ुदसियों के बस का नहीं उन्हीं का काम है ये जिन के हौसले हैं ज़ियाद — Allama Iqbal
नाला है बुलबुल-ए-शोरीदा तिरा ख़ाम अभी अपने सीने में इसे और ज़रा थाम अभी पुख़्ता होती है अगर मस्लहत-अंदेश हो अक़्ल इश्क़ हो मस्लहत-अंदेश तो है ख़ाम अभी बे-ख़तर कूद पड़ा आतिश-ए-नमरूद में इश्क़ अक़्ल है महव-ए-तमाशा-ए-लब-ए-बाम अभी इश्क़ फ़र्मूदा-ए-क़ासिद से सुबुक-गाम-ए-अमल अक़्ल समझी ही नहीं म'अनी-ए-पैग़ाम अभी शेवा-ए-इश्क़ है आज़ादी ओ दहर-आशेबी तू है ज़ुन्नारी-ए-बुत-ख़ाना-ए-अय्याम अभी उज़्र-ए-परहेज़ पे कहता है बिगड़ कर साक़ी है तिरे दिल में वही काविश-ए-अंजाम अभी सई-ए-पैहम है तराज़ू-कम-ओ-कैफ़-ए-हयात तेरी मीज़ाँ है शुमार-ए-सहर-ओ-शाम अभी अब्र-ए-नैसाँ ये तुनुक-बख़्शी-ए-शबनम कब तक मेरे कोहसार के लाले हैं तही-जाम अभी बादा-गर्दान-ए-अजम वो अरबी मेरी शराब मिरे साग़र से झिजकते हैं मय-आशाम अभी ख़बर 'इक़बाल' की लाई है गुलिस्ताँ से नसीम नौ-गिरफ़्तार फड़कता है तह-ए-दाम अभी — Allama Iqbal
ख़ुदी हो इल्म से मोहकम तो ग़ैरत-ए-जिब्रील अगर हो इश्क़ से मोहकम तो सूर-ए-इस्राफ़ील अज़ाब-ए-दानिश-ए-हाज़िर से बा-ख़बर हूँ मैं कि मैं इस आग में डाला गया हूँ मिस्ल-ए-ख़लील फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-मंज़िल है कारवाँ वर्ना ज़ियादा राहत-ए-मंज़िल से है नशात-ए-रहील नज़र नहीं तो मिरे हल्क़ा-ए-सुख़न में न बैठ कि नुक्ता-हा-ए-ख़ुदी हैं मिसाल-ए-तेग़-ए-असील मुझे वो दर्स-ए-फ़रंग आज याद आते हैं कहाँ हुज़ूर की लज़्ज़त कहाँ हिजाब-ए-दलील अँधेरी शब है जुदा अपने क़ाफ़िले से है तू तिरे लिए है मिरा शोला-ए-नवा क़िंदील ग़रीब ओ सादा ओ रंगीं है दस्तान-ए-हरम निहायत इस की हुसैन इब्तिदा है इस्माईल — Allama Iqbal
हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़ यही रहा है अज़ल से क़लंदरों का तरीक़ हुजूम क्यूँँ है ज़ियादा शराब-ख़ाने में फ़क़त ये बात कि पीर-ए-मुग़ाँ है मर्द-ए-ख़लीक़ इलाज-ए-ज़ोफ़-ए-यक़ीं इन से हो नहीं सकता ग़रीब अगरचे हैं 'राज़ी' के नुक्ता-हाए-दक़ीक़ मुरीद-ए-सादा तो रो रो के हो गया ताइब ख़ुदा करे कि मिले शैख़ को भी ये तौफ़ीक़ उसी तिलिस्म-ए-कुहन में असीर है आदम बग़ल में उस की हैं अब तक बुतान-ए-अहद-ए-अतीक़ मिरे लिए तो है इक़रार-ए-बिल-लिसाँ भी बहुत हज़ार शुक्र कि मुल्ला हैं साहिब-ए-तसदीक़ अगर हो इश्क़ तो है कुफ़्र भी मुसलमानी न हो तो मर्द-ए-मुसलमाँ भी काफ़िर ओ ज़िंदीक़ — Allama Iqbal
इक दानिश-ए-नूरानी इक दानिश-ए-बुरहानी है दानिश-ए-बुरहानी हैरत की फ़रावानी इस पैकर-ए-ख़ाकी में इक शय है सो वो तेरी मेरे लिए मुश्किल है इस शय की निगहबानी अब क्या जो फ़ुग़ाँ मेरी पहुँची है सितारों तक तू ने ही सिखाई थी मुझ को ये ग़ज़ल-ख़्वानी हो नक़्श अगर बातिल तकरार से क्या हासिल क्या तुझ को ख़ुश आती है आदम की ये अर्ज़ानी मुझ को तो सिखा दी है अफ़रंग ने ज़िंदीक़ी इस दौर के मुल्ला हैं क्यूँँ नंग-ए-मुसलमानी तक़दीर शिकन क़ुव्वत बाक़ी है अभी इस में नादाँ जिसे कहते हैं तक़दीर का ज़िंदानी तेरे भी सनम-ख़ाने मेरे भी सनम-ख़ाने दोनों के सनम ख़ाकी दोनों के सनम फ़ानी — Allama Iqbal
मुझे आह-ओ-फ़ुग़ान-ए-नीम-शब का फिर पयाम आया थम ऐ रह-रौ कि शायद फिर कोई मुश्किल मक़ाम आया ज़रा तक़दीर की गहराइयों में डूब जा तू भी कि इस जंगाह से मैं बन के तेग़-ए-बे-नियाम आया ये मिसरा लिख दिया किस शोख़ ने मेहराब-ए-मस्जिद पर ये नादाँ गिर गए सज्दों में जब वक़्त-ए-क़याम आया चल ऐ मेरी ग़रीबी का तमाशा देखने वाले वो महफ़िल उठ गई जिस दम तो मुझ तक दौर-ए-जाम आया दिया 'इक़बाल' ने हिन्दी मुसलमानों को सोज़ अपना ये इक मर्द-ए-तन-आसाँ था तन-आसानों के काम आया उसी 'इक़बाल' की मैं जुस्तुजू करता रहा बरसों बड़ी मुद्दत के बा'द आख़िर वो शाहीं ज़ेर-ए-दाम आया — Allama Iqbal
ढूँड रहा है फ़रंग ऐश-ए-जहाँ का दवाम वा-ए-तमन्ना-ए-ख़ाम वा-ए-तमन्ना-ए-ख़ाम पीर-ए-हरम ने कहा सुन के मेरी रूएदाद पुख़्ता है तेरी फ़ुग़ाँ अब न इसे दिल में थाम था अरेनी गो कलीम मैं अरेनी गो नहीं उस को तक़ाज़ा रवा मुझ पे तक़ाज़ा हराम गरचे है इफ़शा-ए-राज़ अहल-ए-नज़र की फ़ुग़ाँ हो नहीं सकता कभी शेवा-ए-रिंदाना आम हल्क़ा-ए-सूफ़ी में ज़िक्र बे-नम ओ बे-सोज़-ओ-साज़ मैं भी रहा तिश्ना-काम तू भी रहा तिश्ना-काम इश्क़ तिरी इंतिहा इश्क़ मिरी इंतिहा तू भी अभी ना-तमाम मैं भी अभी ना-तमाम आह कि खोया गया तुझ से फ़क़ीरी का राज़ वर्ना है माल-ए-फ़क़ीर सल्तनत-ए-रूम-ओ-शाम — Allama Iqbal
न तख़्त-ओ-ताज में ने लश्कर-ओ-सिपाह में है जो बात मर्द-ए-क़लंदर की बारगाह में है सनम-कदा है जहाँ और मर्द-ए-हक़ है ख़लील ये नुक्ता वो है कि पोशीदा ला-इलाह में है वही जहाँ है तिरा जिस को तू करे पैदा ये संग-ओ-ख़िश्त नहीं जो तिरी निगाह में है मह ओ सितारा से आगे मक़ाम है जिस का वो मुश्त-ए-ख़ाक अभी आवारगान-ए-राह में है ख़बर मिली है ख़ुदायान-ए-बहर-ओ-बर से मुझे फ़रंग रहगुज़र-ए-सैल-ए-बे-पनाह में है तलाश उस की फ़ज़ाओं में कर नसीब अपना जहान-ए-ताज़ा मिरी आह-ए-सुब्ह-गाह में है मिरे कदू को ग़नीमत समझ कि बादा-ए-नाब न मदरसे में है बाक़ी न ख़ानक़ाह में है — Allama Iqbal
मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी मक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी हिजाब इक्सीर है आवारा-ए-कू-ए-मोहब्बत को मिरी आतिश को भड़काती है तेरी देर-पैवंदी गुज़र-औक़ात कर लेता है ये कोह ओ बयाबाँ में कि शाहीं के लिए ज़िल्लत है कार-ए-आशियाँ-बंदी ये फ़ैज़ान-ए-नज़र था या कि मकतब की करामत थी सिखाए किस ने इस्माईल को आदाब-ए-फ़रज़ंदी ज़ियारत-गाह-ए-अहल-ए-अज़्म-ओ-हिम्मत है लहद मेरी कि ख़ाक-ए-राह को मैं ने बताया राज़-ए-अलवंदी मिरी मश्शातगी की क्या ज़रूरत हुस्न-ए-मअ'नी को कि फ़ितरत ख़ुद-ब-ख़ुद करती है लाले की हिना-बंदी — Allama Iqbal
दिगर-गूँ है जहाँ तारों की गर्दिश तेज़ है साक़ी दिल-ए-हर-ज़र्रा में ग़ोग़ा-ए-रुस्ता-ख़े़ज़ है साक़ी मता-ए-दीन-ओ-दानिश लुट गई अल्लाह-वालों की ये किस काफ़िर-अदा का ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ है साक़ी वही देरीना बीमारी वही ना-मोहकमी दिल की इलाज इस का वही आब-ए-नशात-अंगेज़ है साक़ी हरम के दिल में सोज़-ए-आरज़ू पैदा नहीं होता कि पैदाई तिरी अब तक हिजाब-आमेज़ है साक़ी न उट्ठा फिर कोई 'रूमी' अजम के लाला-ज़ारों से वही आब-ओ-गिल-ए-ईराँ वही तबरेज़ है साक़ी नहीं है ना-उमीद 'इक़बाल' अपनी किश्त-ए-वीराँ से ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी फ़क़ीर-ए-राह को बख़्शे गए असरार-ए-सुल्तानी बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साक़ी — Allama Iqbal
तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना वो अदब-गह-ए-मोहब्बत वो निगह का ताज़ियाना ये बुतान-ए-अस्र-ए-हाज़िर कि बने हैं मदरसे में न अदा-ए-काफ़िराना न तराश-ए-आज़राना नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना रग-ए-ताक मुंतज़िर है तिरी बारिश-ए-करम की कि अजम के मय-कदों में न रही मय-ए-मुग़ाना मिरे हम-सफ़ीर इसे भी असर-ए-बहार समझे उन्हें क्या ख़बर कि क्या है ये नवा-ए-आशिक़ाना मिरे ख़ाक ओ ख़ूँ से तू ने ये जहाँ किया है पैदा सिला-ए-शाहिद क्या है तब-ओ-ताब-ए-जावेदाना तिरी बंदा-परवरी से मिरे दिन गुज़र रहे हैं न गिला है दोस्तों का न शिकायत-ए-ज़माना — Allama Iqbal
ये पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुब्ह-गाही कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मक़ाम पादशाही तिरी ज़िंदगी इसी से तिरी आबरू इसी से जो रही ख़ुदी तो शाही न रही तो रू-सियाही न दिया निशान-ए-मंज़िल मुझे ऐ हकीम तू ने मुझे क्या गिला हो तुझ से तू न रह-नशीं न राही मिरे हल्क़ा-ए-सुख़न में अभी ज़ेर-ए-तर्बियत हैं वो गदा कि जानते हैं रह-ओ-रस्म-ए-कज-कुलाही ये मुआमले हैं नाज़ुक जो तिरी रज़ा हो तू कर कि मुझे तो ख़ुश न आया ये तरिक़-ए-ख़ानक़ाही तू हुमा का है शिकारी अभी इब्तिदा है तेरी नहीं मस्लहत से ख़ाली ये जहान-ए-मुर्ग़-ओ-माही तू अरब हो या अजम हो तिरा ला इलाह इल्ला लुग़त-ए-ग़रीब जब तक तिरा दिल न दे गवाही — Allama Iqbal

Nazm

चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है — Allama Iqbal