asar kare na kare sun to le mirii fariyaad | असर करे न करे सुन तो ले मिरी फ़रियाद

  - Allama Iqbal

असर करे न करे सुन तो ले मिरी फ़रियाद
नहीं है दाद का तालिब ये बंदा-ए-आज़ाद

ये मुश्त-ए-ख़ाक ये सरसर ये वुसअ'त-ए-अफ़्लाक
करम है या कि सितम तेरी लज़्ज़त-ए-ईजाद

ठहर सका न हवा-ए-चमन में ख़ेमा-ए-गुल
यही है फ़स्ल-ए-बहारी यही है बाद-ए-मुराद

क़ुसूर-वार ग़रीब-उद-दयार हूँ लेकिन
तिरा ख़राबा फ़रिश्ते न कर सके आबाद

मिरी जफ़ा-तलबी को दुआएँ देता है
वो दश्त-ए-सादा वो तेरा जहान-ए-बे-बुनियाद

ख़तर-पसंद तबीअत को साज़गार नहीं
वो गुल्सिताँ कि जहाँ घात में न हो सय्याद

मक़ाम-ए-शौक़ तिरे क़ुदसियों के बस का नहीं
उन्हीं का काम है ये जिन के हौसले हैं ज़ियाद

  - Allama Iqbal

Zulm Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Allama Iqbal

As you were reading Shayari by Allama Iqbal

Similar Writers

our suggestion based on Allama Iqbal

Similar Moods

As you were reading Zulm Shayari Shayari