mata-e-be-baha hai dard-o-soz-e-aarzooman | मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी

  - Allama Iqbal

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी
मक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी

तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया
यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी

हिजाब इक्सीर है आवारा-ए-कू-ए-मोहब्बत को
मिरी आतिश को भड़काती है तेरी देर-पैवंदी

गुज़र-औक़ात कर लेता है ये कोह ओ बयाबाँ में
कि शाहीं के लिए ज़िल्लत है कार-ए-आशियाँ-बंदी

ये फ़ैज़ान-ए-नज़र था या कि मकतब की करामत थी
सिखाए किस ने इस्माईल को आदाब-ए-फ़रज़ंदी

ज़ियारत-गाह-ए-अहल-ए-अज़्म-ओ-हिम्मत है लहद मेरी
कि ख़ाक-ए-राह को मैं ने बताया राज़-ए-अलवंदी

मिरी मश्शातगी की क्या ज़रूरत हुस्न-ए-मअ'नी को
कि फ़ितरत ख़ुद-ब-ख़ुद करती है लाले की हिना-बंदी

  - Allama Iqbal

Naqab Shayari

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