Lala Madhav Ram Jauhar

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Lala Madhav Ram Jauhar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Lala Madhav Ram Jauhar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ग़ैरों से तो फ़ुर्सत तुम्हें दिन रात नहीं है हाँ मेरे लिए वक़्त-ए-मुलाक़ात नहीं है — Lala Madhav Ram Jauhar
वही शागिर्द फिर हो जाते हैं उस्ताद ऐ 'जौहर' जो अपने जान-ओ-दिल से ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं — Lala Madhav Ram Jauhar
जो दोस्त हैं वो माँगते हैं सुलह की दुआ दुश्मन ये चाहते हैं कि आपस में जंग हो — Lala Madhav Ram Jauhar
मोहब्बत को छुपाए लाख कोई छुप नहीं सकती ये वो अफ़्साना है जो बे-कहे मशहूर होता है — Lala Madhav Ram Jauhar
मेरी ही जान के दुश्मन हैं नसीहत वाले मुझ को समझाते हैं उन को नहीं समझाते हैं — Lala Madhav Ram Jauhar
आप तो मुँह फेर कर कहते हैं आने के लिए वस्ल का वा'दा ज़रा आँखें मिला कर कीजिए — Lala Madhav Ram Jauhar
दोस्त दिल रखने को करते हैं बहाने क्या क्या रोज़ झूटी ख़बर-ए-वस्ल सुना जाते हैं — Lala Madhav Ram Jauhar
मुँह पर नक़ाब-ए-ज़र्द हर इक ज़ुल्फ़ पर गुलाल होली की शाम ही तो सहर है बसंत की — Lala Madhav Ram Jauhar
नाला-ए-बुलबुल-ए-शैदा तो सुना हँस हँस कर अब जिगर थाम के बैठो मिरी बारी आई — Lala Madhav Ram Jauhar
भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं — Lala Madhav Ram Jauhar

Ghazal

हरम में मुद्दतों ढूँडा शिवालों में फिरा बरसों तलाश-ए-यार में भटका किया मैं बार-हा बरसों महीनों हाथ जोड़े की ख़ुशामद बार-हा बरसों इन्हें झगड़ों में मुझ को हो गए ऐ बे-वफ़ा बरसों मआज़-अल्लाह इस आज़ुर्दगी का क्या ठिकाना है जो पूछा यार से कब तक न बोलोगे कहा बरसों ग़नीमत जान जो दिन ज़िंदगी के ऐश में गुज़रें किसी का भी नहीं रहता ज़माना एक सा बरसों वही ख़ून-ए-शहीद-ए-नाज़ अब बर्बाद होता है रहा बन कर जो तेरे हाथ में रंग-ए-हिना बरसों हमारी बे-क़रारी का ज़रा तुम को न ध्यान आया महीनों मुंतज़िर रक्खा दिखाया रास्ता बरसों ज़माने में हमेशा हर महीने चाँद होता है तिरा जल्वा नज़र आता नहीं ऐ मह-लक़ा बरसों वहीं पर ले चली बे-ताबी-ए-दिल वाह-री क़िस्मत फिरा की सर पटकती जिस जगह मेरी दुआ बरसों अदा हो शुक्र क्यूँँ-कर बे-कसी ओ ना-उमीदी का रही हैं साथ फ़ुर्क़त में यही दो आश्ना बरसों न आया एक दिन भी वो बुत-ए-बे-रहम ऐ 'जौहर' उठा कर हाथ काबे की तरफ़ माँगी दुआ बरसों — Lala Madhav Ram Jauhar
पए-गुल-गश्त सुना है कि वो आज आते हैं फूलों की भी ये ख़ुशी है कि खिले जाते हैं बहर-ए-तस्कीन-ए-दिल अहबाब ये फ़रमाते हैं आप कहिए तो अभी जा के बुला लाते हैं गुदगुदी कर के हँसाते हैं जो ग़श में अहबाब किस के रूमाल से तलवे मिरे सहलाते हैं आप के होते किसी और को चाहूँ तौबा किस तरफ़ ध्यान है क्या आप ये फ़रमाते हैं मेरी ही जान के दुश्मन हैं नसीहत वाले मुझ को समझाते हैं उन को नहीं समझाते हैं बुलबुलो बाग़ में ग़ाफ़िल न कहीं हो जाना हर तरफ़ घात में सय्याद नज़र आते हैं ख़ूब पहचान लिया हम ने तुम्हें दिल दे कर सच कहा है कि जो खोते हैं वही पाते हैं मुझ को बावर नहीं सच सच ये बता दे हमदम तू ने किस से ये सुना है कि वो आज आते हैं क्या दिल ओ दीदा भी हरकारे हैं सुब्हान-अल्लाह लाख पर्दों में कोई हो ये ख़बर लाते हैं देख अच्छा नहीं 'जौहर' कहीं माइल होना जब भी समझाते थे अब भी तुझे समझाते हैं — Lala Madhav Ram Jauhar
ये वाइज़ कैसी बहकी बहकी बातें हम से करते हैं कहीं चढ़ कर शराब-ए-इश्क़ के नश्शे उतरते हैं ख़ुदा समझे ये क्या सय्याद ओ गुलचीं ज़ुल्म करते हैं गुलों को तोड़ते हैं बुलबुलों के पर कतरते हैं दया दम नज़अ में गो आप ने पर रूह चल निकली किसी के रोकने से जाने वाले कब ठहरते हैं ज़रा रहने दो अपने दर पे हम ख़ाना-ब-दोशों को मुसाफ़िर जिस जगह आराम पाते हैं ठहरते हैं न आ जाया करो अग़्यार की उल्फ़त जताने में वो तुम पर क्यूँँ भला मरने लगे फ़ाक़ों से मरते हैं हर इक मौसम में किश्त-ए-आरज़ू सरसब्ज़ रहती है तरद्दुद ग़ैर को होगा यहाँ तो चैन करते हैं ये जोड़ा खोलना भी हेच से ख़ाली नहीं उन का उलझ जाता है दिल जब बाल शानों पर बिखरते हैं समझ लेना तुम्हारा ऐ रक़ीबो कुछ नहीं मुश्किल ख़ुदा जाने ये किस का ख़ौफ़ है हम किस से डरते हैं तकल्लुफ़ के ये मअ'नी हैं समझ लो बे-कहे दिल की मज़ा क्या जब हमीं ने ये कहा तुम से कि मरते हैं — Lala Madhav Ram Jauhar
होते ख़ुदा के उस बुत-ए-काफ़िर की चाह की इतनी तो बात मुझ से हुई है गुनाह की सोज़-ए-दरूँ किया जो मिरा शम्अ' ने बयाँ जल कर ज़बान काट ली मेरे गवाह की भरता है आज ख़ूब तरारे समंद-ए-नाज़ क़ुमची है उन के हाथ में ज़ुल्फ़-ए-सियाह की देखा हुज़ूर को जो मुकद्दर तो मर गए हम मिट गए जो आप ने मैली निगाह की फ़ुर्क़त में याद आए जो लुत्फ़-ए-शब-ए-विसाल इक आह भर के जानिब-ए-गर्दूं निगाह की सुनसान कर दिया मिरे पहलू को ले के दिल ज़ालिम ने लूट कर मिरी बस्ती तबाह की वो मुझ से कह रहे हैं इशारों में देखना सब ताड़ जाएँगे सर-ए-महफ़िल जो आह की हम वो थे दिल ही दिल में किया ज़ब्त-ए-राज़-ए-इश्क़ सद में उठा के मर गए मुँह से न आह की अफ़्सोस है कि मैं तो फिरूँ दर-ब-दर ख़राब तुम को ख़बर न हो मिरे हाल-ए-तबाह की 'जौहर' ख़ुदा के फ़ज़्ल से ऐसी ग़ज़ल कही शोहरत मुशाइरे में हुई वाह-वाह की — Lala Madhav Ram Jauhar
दिल जब से तिरे हिज्र में बीमार पड़ा है जीने से ख़फ़ा जान से बे-ज़ार पड़ा है सौदा न बना गेसू-ए-जानाँ से तो क्या ग़म ले लेंगे कहीं और से बाज़ार पड़ा है परहेज़ तप-ए-हिज्र से है तुझ को जो ऐ दिल तू और भी आगे कभी बीमार पड़ा है फ़रमाइए रोके से रुके हैं कभी आशिक़ दरवाज़े पे क़ुफ़्ल आप के सौ बार पड़ा है मैं दैर ओ हरम हो के तिरे कूचे में पहुँचा दो मंज़िलों का फेर बस ऐ यार पड़ा है की तर्क-ए-मोहब्बत तो लिया दर्द-ए-जिगर मोल परहेज़ से दिल और भी बीमार पड़ा है तौक़ीर नहीं अंजुमन-ए-ख़ास में दिल की शीशा तिरे मय-ख़ाना में बेकार पड़ा है कुछ शाम-ए-जुदाई में सुझाई नहीं देता पर्दा ख़िरद ओ होश पे ऐ यार पड़ा है 'जौहर' कहीं बिकती ही नहीं जिंस-ए-मोहब्बत क्या क़हत वफ़ा का सर-ए-बाज़ार पड़ा है — Lala Madhav Ram Jauhar
कैसा ही दोस्त हो न कहे राज़-ए-दिल कोई निकली जो बात मुँह से तो फैली जहान में सच सच कहो ये बात बनाना नहीं पसंद क्या कह रहे थे ग़ैर अभी चुपके से कान में पूछा है हाल-ए-ज़ार तो सुन लो ख़ता मुआ'फ़ कुछ बात मेरे होंटों में है कुछ ज़बान में आशिक़ से पूछिए न सर-ए-बज़्म हाल-ए-दिल पर्दे की बात सुनते हैं चुपके से कान में फ़ुर्क़त में क्या बताऊँ कि दिन है कि रात है आँखों को सूझता नहीं रोने के ध्यान में क़स्र-ए-जहाँ है तेरे फ़क़ीरों का झोंपड़ा महलों से बढ़ के चैन है अपने मकान में दो दिन की ज़िंदगी में जो चाहे कोई करे रह जाती है भलाई बुराई जहान में — Lala Madhav Ram Jauhar
रोज़ कहते थे कभी ग़ैर के घर देख लिया आज तो आँख से ऐ रश्क-ए-क़मर देख लिया काबा-ए-दिल से मिली मंज़िल-ए-मक़्सूद की राह यार का हम ने उसी कूचे में घर देख लिया जानिब-ए-ग़ैर इशारा जो हुआ जानते हैं हम ने ख़ुद आँख से देखा कि इधर देख लिया कौन सोता है किसे हिज्र में नींद आती है ख़्वाब में किस ने तुम्हें एक नज़र देख लिया जब कहा मैं ने नहीं कोई चलो मेरे घर ख़ूब रस्ते में इधर और उधर देख लिया बोले चलने में नहीं उज़्र मुझे कुछ लेकिन ख़ौफ़ ये है किसी मुफ़सिद ने अगर देख लिया आहों से आग लगा देंगे दिल-ए-दुश्मन में छुप के रहते हैं जहाँ आप का घर देख लिया बच गया नक़्द-ए-दिल अब के तो नज़र से उस की आएगा फिर भी अगर चोर ने घर देख लिया — Lala Madhav Ram Jauhar
किसी को लाख अलम हो ज़रा मलाल नहीं कोई मरे कि जिए कुछ उन्हें ख़याल नहीं ये जानता हूँ मगर क्या करूँँ तबीअ'त को कि मय हराम है ऐ वाइज़ो हलाल नहीं अबस ग़ुरूर है मँगवा के आइना देखो वो रंग-ओ-रूप नहीं अब वो सिन ओ साल नहीं हुज़ूर आप जो होते तो कोई क्यूँँ बनता ये ख़ूबी आप की है ग़ैर की मजाल नहीं इधर तो देखो हमें दो ही दिन में भूल गए ये बे-मुरव्वती अल्लाह कुछ ख़याल नहीं बहार-ए-हुस्न ये दो दिन की चाँदनी है हुज़ूर जो बात अब की बरस है वो पार-साल नहीं हज़र न कीजिए मिलने से ख़ाकसारों के दुआ तो है जो फ़क़ीरों के पास माल नहीं किसी ने जा के बुराई कही जो 'जौहर' की कहा ये झूट है उस की तो ये मजाल नहीं — Lala Madhav Ram Jauhar