meri hi jaan ke dushman hain naseehat waale | मेरी ही जान के दुश्मन हैं नसीहत वाले

  - Lala Madhav Ram Jauhar

मेरी ही जान के दुश्मन हैं नसीहत वाले
मुझ को समझाते हैं उन को नहीं समझाते हैं

  - Lala Madhav Ram Jauhar

Nafrat Shayari

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    अब दोस्त कोई लाओ मुकाबिल में हमारे
    दुश्मन तो कोई क़द के बराबर नहीं निकला
    Munawwar Rana
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    अब के बार मिल के यूँ साल-ए-नौ मनाएँगे
    रंजिशें भुला कर हम नफ़रतें मिटाएँगे
    Unknown
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    उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
    वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
    Nida Fazli
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    हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं
    मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं
    Rahat Indori
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    जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो
    ये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब न हो
    Nazeer Akbarabadi
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    जो दोस्त हैं वो माँगते हैं सुलह की दुआ
    दुश्मन ये चाहते हैं कि आपस में जंग हो
    Lala Madhav Ram Jauhar
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    इसलिए लड़ता है मुझसे मेरा दुश्मन
    उसका भी मेरे सिवा कोई नहीं है
    Aves Sayyad
    नए साल में पिछली नफ़रत भुला दें
    चलो अपनी दुनिया को जन्नत बना दें
    Unknown
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    दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता
    दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए
    Nida Fazli
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    मुनाफ़िक़ दोस्तों से लाख बेहतर हैं ख़ुदा दुश्मन
    कि ग़द्दारी नवाबों से हुकूमत छीन लेती है
    Unknown
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    दोस्त दिल रखने को करते हैं बहाने क्या क्या
    रोज़ झूटी ख़बर-ए-वस्ल सुना जाते हैं
    Lala Madhav Ram Jauhar
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    क्या याद कर के रोऊँ कि कैसा शबाब था
    कुछ भी न था हवा थी कहानी थी ख़्वाब था

    अब इत्र भी मलो तो तकल्लुफ़ की बू कहाँ
    वो दिन हवा हुए जो पसीना गुलाब था

    महमिल-नशीं जब आप थे लैला के भेस में
    मजनूँ के भेस में कोई ख़ाना-ख़राब था

    तेरा क़ुसूर-वार ख़ुदा का गुनाहगार
    जो कुछ कि था यही दिल-ए-ख़ाना-ख़राब था

    ज़र्रा समझ के यूँ न मिला मुझ को ख़ाक में
    ऐ आसमान मैं भी कभी आफ़्ताब था
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    Lala Madhav Ram Jauhar
    हरम में मुद्दतों ढूँडा शिवालों में फिरा बरसों
    तलाश-ए-यार में भटका किया मैं बार-हा बरसों

    महीनों हाथ जोड़े की ख़ुशामद बार-हा बरसों
    इन्हें झगड़ों में मुझ को हो गए ऐ बेवफ़ा बरसों

    मआज़-अल्लाह इस आज़ुर्दगी का क्या ठिकाना है
    जो पूछा यार से कब तक न बोलोगे कहा बरसों

    ग़नीमत जान जो दिन ज़िंदगी के ऐश में गुज़रें
    किसी का भी नहीं रहता ज़माना एक सा बरसों

    वही ख़ून-ए-शहीद-ए-नाज़ अब बर्बाद होता है
    रहा बन कर जो तेरे हाथ में रंग-ए-हिना बरसों

    हमारी बे-क़रारी का ज़रा तुम को न ध्यान आया
    महीनों मुंतज़िर रक्खा दिखाया रास्ता बरसों

    ज़माने में हमेशा हर महीने चाँद होता है
    तिरा जल्वा नज़र आता नहीं ऐ मह-लक़ा बरसों

    वहीं पर ले चली बे-ताबी-ए-दिल वाह-री क़िस्मत
    फिरा की सर पटकती जिस जगह मेरी दुआ बरसों

    अदा हो शुक्र क्यूँ-कर बे-कसी ओ ना-उमीदी का
    रही हैं साथ फ़ुर्क़त में यही दो आश्ना बरसों

    न आया एक दिन भी वो बुत-ए-बे-रहम ऐ 'जौहर'
    उठा कर हाथ काबे की तरफ़ माँगी दुआ बरसों
    Read Full
    Lala Madhav Ram Jauhar
    बू-ए-गुल सूँघ कर बिगड़ते हैं
    ये परी-रू हवा से लड़ते हैं

    क्यूँ जवानी के पीछे पड़ते हैं
    भागते को नहीं पकड़ते हैं

    एक दिन वो ज़मीन देखेंगे
    ऐ फ़लक आज को अकड़ते हैं

    मल रहे हैं वो अपने घर मेहंदी
    हम यहाँ एड़ियाँ रगड़ते हैं

    नामा-बर ना-उमीद आता है
    हाए क्या सुस्त पाँव पड़ते हैं

    जिस के हैं उस के हैं हम ऐ जौहर
    यार बन कर कहीं बिगड़ते हैं
    Read Full
    Lala Madhav Ram Jauhar
    भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया
    ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं
    Lala Madhav Ram Jauhar
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