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Lala Madhav Ram Jauhar
SHER
10
GHAZAL
तेरे कूचे की हुआ लग गई शायद उस को
रोज़ बे-पर की उड़ाता है कबूतर हम से
Lala Madhav Ram Jauhar
9
GHAZAL
क्या याद कर के रोऊँ कि कैसा शबाब था
कुछ भी न था हवा थी कहानी थी ख़्वाब था
Lala Madhav Ram Jauhar
8
SHER
वही शागिर्द फिर हो जाते हैं उस्ताद ऐ 'जौहर'
जो अपने जान-ओ-दिल से ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
7
SHER
जो दोस्त हैं वो माँगते हैं सुलह की दुआ
दुश्मन ये चाहते हैं कि आपस में जंग हो
Lala Madhav Ram Jauhar
6
SHER
मुँह पर नक़ाब-ए-ज़र्द हर इक ज़ुल्फ़ पर गुलाल
होली की शाम ही तो सहर है बसंत की
Lala Madhav Ram Jauhar
5
SHER
मोहब्बत को छुपाए लाख कोई छुप नहीं सकती
ये वो अफ़्साना है जो बे-कहे मशहूर होता है
Lala Madhav Ram Jauhar
4
SHER
नाला-ए-बुलबुल-ए-शैदा तो सुना हँस हँस कर
अब जिगर थाम के बैठो मिरी बारी आई
Lala Madhav Ram Jauhar
3
SHER
मेरी ही जान के दुश्मन हैं नसीहत वाले
मुझ को समझाते हैं उन को नहीं समझाते हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
2
GHAZAL
रात दिन चैन हम ऐ रश्क-ए-क़मर रखते हैं
शाम अवध की तो बनारस की सहर रखते हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
1
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