dhundh raha hai farang aish-e-jahaan ka davaam | ढूँड रहा है फ़रंग ऐश-ए-जहाँ का दवाम

  - Allama Iqbal

ढूँड रहा है फ़रंग ऐश-ए-जहाँ का दवाम
वा-ए-तमन्ना-ए-ख़ाम वा-ए-तमन्ना-ए-ख़ाम

पीर-ए-हरम ने कहा सुन के मेरी रूएदाद
पुख़्ता है तेरी फ़ुग़ाँ अब न इसे दिल में थाम

था अरेनी गो कलीम मैं अरेनी गो नहीं
उस को तक़ाज़ा रवा मुझ पे तक़ाज़ा हराम

गरचे है इफ़शा-ए-राज़ अहल-ए-नज़र की फ़ुग़ाँ
हो नहीं सकता कभी शेवा-ए-रिंदाना आम

हल्क़ा-ए-सूफ़ी में ज़िक्र बे-नम ओ बे-सोज़-ओ-साज़
मैं भी रहा तिश्ना-काम तू भी रहा तिश्ना-काम
'इश्क़ तिरी इंतिहा 'इश्क़ मिरी इंतिहा
तू भी अभी ना-तमाम मैं भी अभी ना-तमाम

आह कि खोया गया तुझ से फ़क़ीरी का राज़
वर्ना है माल-ए-फ़क़ीर सल्तनत-ए-रूम-ओ-शाम

  - Allama Iqbal

Ulfat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Allama Iqbal

As you were reading Shayari by Allama Iqbal

Similar Writers

our suggestion based on Allama Iqbal

Similar Moods

As you were reading Ulfat Shayari Shayari