इक तमाशा-ए-अक़ीदत ही बना रक्खा है
वरना इस दैर में क्या बुत के सिवा रक्खा है
जिस्म तो पहले ही ज़िंदान था उस पर मैने
दिल को भी हल्क़ा-ए-ज़ंजीर बना रक्खा है
तू बुझाएगा तो ये और भड़क जाएगी
मैंने जिस आग को सीने में जला रक्खा है
शौक़-ए-दीदार ज़रुरी है मुझे वैसे मैं
जानता हूँ तेरी तस्वीर में क्या रक्खा है
काट भी सकती है वो लश्कर-ए-दुश्मन इस सेे
उसने जो आँख को शमशीर बना रक्खा है
आग दामन में तुम्हारे न लगा जाए वही
आज कल तुमने जिसे अपना ख़ुदा रक्खा है
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